राजयोग (स्वामी विवेकानन्द - पातञ्जल योगसूत्र भाष्य सहित)
Raja Yoga - Swami Vivekananda with Patanjali Yoga Sutras
by स्वामी विवेकानन्द / महर्षि पतञ्जलि
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अन्त करण को उसके प्रति करुणापूर्ण होना चाहिए । यदि वह कोई शुभ विषय हो, तो हमें आनन्दित होना चाहिए, तथा असत् विषय होने पर उसके प्रति उदासीन रहना ही श्रेयस्कर है । इन सब विभिन्न विषयों के प्रति मन के इस प्रकार विभिन्न भाव धारण करने से मन शान्त हो जायगा । मन की इस प्रकार के विभिन्न भावों को धारण करने की असमर्थता ही हमारे दैनिक जीवन की अधिकांश गडबडी एव अशान्ति का कारण है । मान लो, किसी ने मेरे प्रति कोई अनुचित व्यवहार किया । तो मै तुरन्त उसका प्रतिकार करने को उद्यत हो जाता हूँ । और इस प्रकार बदला लेने की भावना ही यह दर्शा देती है कि हम चित्त को दवा रखने मे असमर्थ हो रहे हैं । वह उस वस्तु की ओर तरगाकार में प्रवाहित होता है, और बस हम अपनी मन की शक्ति खो बैठते हैं । हमारे मन मे घृणा अथवा दूसरो का अनिष्ट करने की प्रवृत्ति के रूप में जो प्रतिक्रिया होती है, वह मन की शक्ति का क्षय मात्र है । दूसरी ओर, यदि किसी अशुभ विचार या घृणाप्रसूत कार्य अथवा किसी प्रकार की प्रतिक्रिया की भावना का दमन किया जाय, तो उससे शुभकरी शक्ति उत्पन्न होकर हमारे ही उपकार के लिए सचित रहती है । यह बात नही कि इस प्रकार के सयम से हमारी कोई क्षति होती हो, वरन् उससे तो हमारा आशातीत उपकार ही होता है । जब कभी हम घृणा अथवा क्रोध की वृत्ति को संयत करते हैं, तभी वह हमारे अनुकूल शुभ शक्ति के रूप में सचित होकर उच्चतर शक्ति मे परिणत हो जाती है ।
प्रच्छर्दनविधारणाभ्यां वा प्राणस्य ॥३४॥
सूत्रार्थ— अथवा प्राणवायु को बाहर निकालने और धारण करने से भी (चित्त स्थिर होता है) ।