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राजयोग (स्वामी विवेकानन्द - पातञ्जल योगसूत्र भाष्य सहित)

राजयोग (स्वामी विवेकानन्द - पातञ्जल योगसूत्र भाष्य सहित)

Raja Yoga - Swami Vivekananda with Patanjali Yoga Sutras

by स्वामी विवेकानन्द / महर्षि पतञ्जलि

DevanagariHindipublished307 pages

Page 178 of 307

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पातंजल-योगसूत्र १६१

तत्प्रतिषेधार्थमेकतत्त्वाभ्यासः ॥३२॥

**सूत्रार्थ—**उनको दूर करने के लिए एक तत्त्व का अभ्यास (करना चाहिए)।

**व्याख्या—**कुछ समय तक के लिए मन को किसी विशिष्ट विषय के आकार में परिणत करने की चेष्टा करने से पूर्वोक्त विघ्न दूर हो जाते हैं। यह उपदेश अत्यन्त साधारण रूप से दिया गया है। अगले सूत्रो में यही उपदेश विस्तृत रूप से समझाया जायगा और विशिष्ट ध्येय-विषयो के सम्बन्ध में इस साधारण उपदेश का प्रयोग बतलाया जायगा। एक ही प्रकार का अभ्यास सब के लिए उपयोगी नही हो सकता, इसी लिए विभिन्न उपायो की बात कही गई है। प्रत्येक मनुष्य स्वयं परीक्षा करके अपने लिए उपयोगी उपाय चुन ले सकता है।

मैत्रीकरुणामुदितोपेक्षाणां सुखदुःखपुण्यापुण्यविषयाणां
भावनातश्चित्तप्रसादनम् ॥३३॥

**सूत्रार्थ—**सुख, दुःख, पुण्य और पाप—इन भावों के प्रति क्रमशः मित्रता, दया, आनन्द और उपेक्षा का भाव धारण कर सकने से चित्त प्रसन्न होता है।

**व्याख्या—**हममें ये चार प्रकार के भाव रहने ही चाहिए। यह आवश्यक है कि हम सब के प्रति मैत्री-भाव रखे, दीन-दुखियों के प्रति दयावान हो, लोगो को सत्कर्म करते देख सुखी हो, और दुष्ट मनुष्य के प्रति उपेक्षा दिखाएँ। इसी प्रकार, जो भी विषय हमारे सामने आते हैं, उन सब के प्रति भी हमारे ये ही भाव रहने चाहिए। यदि कोई विषय सुखकर हो, तो उसके प्रति मित्रता अर्थात् अनुकूल भाव धारण करना चाहिए। इसी तरह, यदि कोई दुखकर घटना हमारी भावना का विषय हो, तो हमारे

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