Skip to content
SarvaKosh
राजयोग (स्वामी विवेकानन्द - पातञ्जल योगसूत्र भाष्य सहित)

राजयोग (स्वामी विवेकानन्द - पातञ्जल योगसूत्र भाष्य सहित)

Raja Yoga - Swami Vivekananda with Patanjali Yoga Sutras

by स्वामी विवेकानन्द / महर्षि पतञ्जलि

DevanagariHindipublished307 pages

Page 109 of 307

Read in context
Page 109

-९२ राजयोग

उन्हे ज्ञानयुक्त क्रिया और जिनमे 'अहं' का लगाव नही, उन्हें ज्ञानरहित या अज्ञानपूर्वक क्रिया कहते है। निम्न जाति के प्राणियों मे यह ज्ञानरहित क्रिया सहज ज्ञान (instinct) कहलाती है। उनकी अपेक्षा उच्चतर जीवो मे और सबसे उच्च जीव मनुष्य में यह दूसरे प्रकार की क्रिया, जिसमें 'अहं'-भाव रहता है, अधिक दीख पडती है—इसी को ज्ञानयुक्त क्रिया कहते है।

परन्तु इतने से ही सारी भूमियो का उल्लेख नही हो गया। मन इन दोनो से भी ऊँची भूमि पर विचरण कर सकता है। मन ज्ञान की भी अतीत अवस्था में जा सकता है। जिस प्रकार अज्ञान-भूमि से जो कार्य होता है, वह ज्ञान की निम्न भूमि का कार्य है, वैसे ही ज्ञान की उच्च भूमि से भी—ज्ञानातीत भूमि से भी कार्य होता है। उसमें भी किसी प्रकार का 'अहं'-भाव नही रहता। यह 'अहं'-भाव केवल बीच की अवस्था मे रहता है। जब मन इस रेखा के ऊपर या नीचे विचरण करता है, तब किसी प्रकार का 'अहं'-ज्ञान नही रहता, किन्तु तब भी मन की क्रिया चलती रहती है। जब मन इस रेखा के ऊपर अर्थात् ज्ञान-भूमि के अतीत प्रदेश मे गमन करता है, तब उसे समाधि, पूर्णचेतन-भूमि या ज्ञानातीत भूमि कहते है। यह समाधि-अवस्था ज्ञान के भी उस पार अवस्थित है। अब हम यह किस तरह समझें कि जो मनुष्य समाधि-अवस्था मे जाता है, वह ज्ञान-भूमि के निम्न स्तर मे नही चला जाता, बिलकुल हीन दशापन्न नही हो जाता, वरन् ज्ञानातीत भूमि मे चला जाता है? इन दोनो ही अवस्थाओ में तो अहं-भाव नही रहता। (इसका उत्तर यह है कि कौन ज्ञान-भूमि के निम्न देश मे और कौन ऊर्ध्व देश मे गया, इसका निर्णय फल देखने पर ही हो सकता है। जब कोई गहरी