राजयोग (स्वामी विवेकानन्द - पातञ्जल योगसूत्र भाष्य सहित)
Raja Yoga - Swami Vivekananda with Patanjali Yoga Sutras
by स्वामी विवेकानन्द / महर्षि पतञ्जलि
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Read in contextध्यान और समाधि ९१
दस-बीस लोग तो बैठे नही है, जो यह काम कर देते हो। पर यह किस तरह हमे मालूम हुआ कि हमी इनको कर रहे है, दूसरा कोई नही? इस सम्बन्ध में अनायास ही यह कहा जा सकता है कि आहार करने के साथ ही हमारा सम्पर्क है, खाना पचाना और उससे देह तैयार करना तो हमारे लिए एक दूसरा कोई कर दे रहा है। पर यह हो नही सकता, क्योकि यह प्रमाणित किया जा सकता है कि अभी जो काम हमारे बिना जाने हो रहे हैं, वे लगभग सभी साधना के बल से हमारे जाने साधित हो सकते हैं। ऐसा मालूम होता है कि हमारा हृदय-यन्त्र अपने-आप ही चल रहा है, हममे से कोई उसको अपनी इच्छानुसार नही चला सकता, वह अपने ख्याल से आप ही चल रहा है। परन्तु इस हृदय के कार्य भी अभ्यास के बल से इस प्रकार इच्छाधीन किए जा सकते हैं कि वे इच्छा मात्र से शीघ्र या धीरे चलने लगेगे, या लगभग बन्द हो जायँगे। हमारे शरीर के प्राय सभी अंग वश में लाए जा सकते है। इससे क्या ज्ञात होता है? यही कि इस समय जो काम हमारे विना जाने हो रहे है, उन्हे भी हम ही कर रहे हैं, पर हाँ, हम उन्हे अज्ञातभाव से कर रहे है, बस इतना ही। अतएव हम देखते है कि मानव-मन दो अवस्थाओ मे रहकर कार्य करता है। पहली अवस्था को ज्ञान-भूमि कह सकते हैं। जिन कामों को करते समय साथ-साथ, 'मै कर रहा हूँ,' यह ज्ञान सदा विद्यमान रहता है, वे कार्य ज्ञान-भूमि से साधित हो रहे हैं, ऐसा कहा जा सकता है। दूसरी भूमि को अज्ञान-भूमि कह सकते हैं। जो सब कार्य ज्ञान की निम्न भूमि से साधित होते है, जिसमे 'मै'-ज्ञान नही रहता, उसे अज्ञान-भूमि कह सकते है।
हमारे कार्यकलापो मे से जिनमें 'अहं' मिला रहता है.-