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रघुवंशम् (मल्लिनाथ संजीवनी व श्रीकृष्णमणि त्रिपाठी हिन्दी व्याख्या)

रघुवंशम् (मल्लिनाथ संजीवनी व श्रीकृष्णमणि त्रिपाठी हिन्दी व्याख्या)

Raghuvamsham of Kalidasa Hindi

by महाकवि कालिदास

Source: Raghuvamsham with Mallinatha Sanjivani & Hindi Commentary by Dr. Shrikrishnamani Tripathi (origin)

DevanagariHindipublished735 pages

Page 401 of 735

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Page 401
३४२रघुवंशमहाकाव्ये

**भाषार्थ—**इतना ही नहीं आकाश गंगा में स्नान करके कश्यपादि सप्तर्षि वेदपाठ करते हुए हम लोगों की ही स्तुति करते है—इस प्रकार के स्वप्नों को देखकर रानियों ने राजा से कहा ॥ ६३ ॥

ताभ्यस्तथाविधान्स्वप्नाञ्छ्रुत्वा प्रीतो हि पार्थिवः।
मेने परार्ध्यमात्मानं गुरुत्वेन जगद्गुरोः॥ ६४॥

**अन्वयः—**पार्थिवः ताभ्यः तथाविधान् स्वप्नान् श्रुत्वा प्रीतः 'सन्' जगद्गुरोः गुरुत्वेन आत्मानं परार्ध्यं मेने हि।

ताभ्य इति। पार्थिवो दशरथस्ताभ्यः पत्नीभ्यः। "आख्यातोपयोगे" इत्यपादानत्वात्पञ्चमी। तथाविधानुक्तप्रकारान्स्वप्नाञ्छ्रुत्वा प्रीतः सन् आत्मानं जगद्गुरोर्विष्णोरपि गुरुत्वेन पितृत्वेन हेतुना परार्ध्यं सर्वोत्कृष्टं मेने हि।

**भाषार्थ—**रानियों से इस प्रकार के स्वप्नों को सुनकर राजा दशरथ अतिप्रसन्न हुए और उन्होंने समझ लिया कि अब संसार में मेरे समान कोई सौभाग्यशाली नहीं है क्योंकि मैं अब संसार के गुरु विष्णु का भी पिता बन रहा हूँ ॥ ६४ ॥

विभक्तात्मा विभुस्तासामेकः कुक्षिष्वनेकधा।
उवास प्रतिमाचन्द्रः प्रसन्नानामपामिव ॥ ६५॥

**अन्वयः—**एकः विभुः तासां कुक्षिषु प्रसन्नानां अपां 'कुक्षिषु' प्रतिमाचन्द्रः इव अनेकधा विभक्तात्मा 'सन्' उवास।

विभक्तेति। एक एकरूपो विभुर्विष्णुस्तासां राजपत्नीनां कुक्षिषु गर्भेषु प्रसन्नानां निर्मलानामपां कुक्षिषु प्रतिमाचन्द्रः प्रतिबिम्बचन्द्र इव। अनेकधा विभक्तात्मा सन् उवास।

**भाषार्थ—**यद्यपि भगवान् विष्णु का एक ही रूप है, फिर भी निर्मल जल के भीतर प्रतिबिम्बित चन्द्रमा के समान अनेक रूप में विभक्त होकर उन रानियों के गर्भ में निवास करने लगे ॥ ६५ ॥

अथाग्रमहिषी राज्ञः प्रसूतिसमये सती।
पुत्रं तमोपहं लेभे नक्तं ज्योतिरिवौषधिः॥ ६६॥

**अन्वयः—**अथ राज्ञः सती अग्रघमहिषी प्रसूतिसमये ओषधिः नक्तं तमोपहं ज्योतिः इव 'तमोपहं' पुत्रं लेभे।

अथेति। अथ राज्ञो दशरथस्य सती पतिव्रता। अग्र्या चासौ महिषी चाग्रघ-महिषी कौसल्या। प्रसूतिसमये प्रसूतिक़ाले ओषधीर्नक्तम् रात्रिसमये तमोऽपहन्तीति