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रघुवंशम् (मल्लिनाथ संजीवनी व श्रीकृष्णमणि त्रिपाठी हिन्दी व्याख्या)

रघुवंशम् (मल्लिनाथ संजीवनी व श्रीकृष्णमणि त्रिपाठी हिन्दी व्याख्या)

Raghuvamsham of Kalidasa Hindi

by महाकवि कालिदास

Source: Raghuvamsham with Mallinatha Sanjivani & Hindi Commentary by Dr. Shrikrishnamani Tripathi (origin)

DevanagariHindipublished735 pages

Page 379 of 735

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Page 379

३२० रघुवंशमहाकाव्ये

को अपनी गोद में रखकर दबा रही हैं, विष्णु के चरणों में करधनी न चुभे
इसलिए करधनी पर अपनी साड़ी का अंचला बिछाया है। इसपर जब लक्ष्मी
जी को सन्तोष न हुआ तब उन्होंने अंचला पर अपना कर पल्लव रख
दिया ॥ ८ ॥

प्रबुद्धपुण्डरीकाक्षं बालातपनिभांशुकम् ।
दिवसं शारदमिव प्रारम्भसुखदर्शनम् ॥ ६ ॥

अन्वयः— (पुनः कथंभूतम् ) प्रबुद्धपुण्डरीकाक्षम् बालातपनिभांशुकम् प्रारम्भ-
मुखदर्शनम् शारदम् दिवसम् इव (स्थितम् )।

प्रबुद्धेति। पुनः कीदृशम् । प्रबुद्धे विकसिते पुण्डरीके सिताम्भोजे इवाक्षिणी
यस्य तम् । दिवसे तु पुण्डरीकमेवाक्षि यस्येति विग्रहः । बालातपनिभमंशुकं यस्य
तं पिताम्बरधरमित्यर्थः । अन्यत्र बालातपव्याजांशुकमित्यर्थः । 'निभो व्याज-
सदृशयोः' इति विश्वः । प्रकृष्ट आरम्भो योगो येषां ते प्रारम्भाः योगिनः तेषां
सुखदर्शनम् । अन्यत्र प्रारम्भ आदौ सुखदर्शनं शारदं शरत्सम्बन्धिनं दिवसमिव
स्थितम् ।

**भाषार्थ'--**खिले हुए श्वेत कमल के समान नेत्रवाले, प्रातःकाल' की धूप के
समान सुनहले पीताम्बर वस्त्र पहने हुए, आरम्भ सुख देने वाले और देखने में
सुन्दर शरद ऋतु के दिन के समान आनन्द पहले देनेवाले भगवान् विष्णु को
देखा ॥ ९ ॥

प्रभानुलिप्तश्रीवत्सं लक्ष्मीविभ्रमदर्पणम् ।
कौस्तुभाख्यमपां सारं बिभ्राणं बृहतोरसा ॥ १० ॥

अन्वयः— (पुनः कीदृशम् ? ) प्रभानुलिप्तश्रीवत्सं लक्ष्मीविभ्रमदर्पणं
कौस्तुभाख्यम् अपाम् सारम् बृहता उरसा बिभ्राणम् ।

प्रभेति । पुनः किंविधं प्रभयाऽलिप्तमनुरंजितं श्रीवत्सं नाम लाञ्छनं येन
तं । लक्ष्म्या विभ्रमदर्पणः । कौस्तुभ इत्याख्या यस्य तम् । अपां समुद्राणां सारं
स्थिरांशम् । अम्मयमणिमित्यर्थः । वृहतोरसा विशालवक्षः स्थलेन बिभ्राणम् ।

**भाषार्थं—**विष्णु भगवान् के विशाल वक्षस्थल पर कौस्तुभ मणि चमक
रहा था जिसमें लक्ष्मी जी कभी-कभी शृंगार के समय अपना मुंह देख लिया
करती और जिसकी प्रभाव से भृगु के चरण के प्रहार से बना हुआ श्रीवत्स
चिह्न भी चमक उठता था ॥ १० ॥

बाहुभिर्विटपाकारैर्दिव्याभरणभूषितै ।
आविर्भूतमपां मध्ये पारिजातमिवापरम् ॥ ११ ॥