प्रबोधसुधाकर (हिन्दी अनुवाद सहित)
Prabodhasudhakara with Hindi Translation - Gita Press
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: गीताप्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस गोरखपुर · 1940 (उद्गम)
विषय-निन्दा
प्रबोधसुधाकर
जिसे सिंहासनपर विराजमान देखकर लोग आनन्दित होते
थे उसी पुरुषको आज कालके गालमें पड़ा देखकर वे नेत्र
मूँद लेते हैं।
एवंविधोऽतिमलिनो देहो यत्सत्तया चलति ।
तं विस्मृत्य परेशं वहत्यहंतामनित्येऽस्मिन् ॥२७॥
ऐसा महामलिन देह जिसकी सत्तासे चलता है उस
परमेश्वरको भुलाकर इस अनित्य और अपवित्र देहमें लोग 'अहं-
बुद्धि' करते हैं !
क्वात्मा सच्चिद्रूपः क मांसरुधिरास्थिनिर्मितो देहः ।
इति यो लज्जति धीमानितरशरीरं स किं मनुते॥२८॥
'कहाँ तो सत्-चित्-स्वरूप आत्मा और कहाँ अस्थि,
मांस और रुधिर आदिका बना हुआ यह अति घृणित देह ?'
ऐसा विचारकर जो बुद्धिमान् लज्जित होता है, वह दूसरोंके देहों-
को क्या समझेगा ? [ उनसे अपना सम्बन्ध क्यों जोड़ेगा ? ]
विषय-निन्दा
मूढः कुरुते विषयजकर्दमसम्मार्जनं मिथ्या ।
दुरदृष्टवृष्टिभिरसौ देहो गेहं पतत्येव ॥२९॥
अविचारी लोग इस विषयभोगजनित मांसपिण्डको व्यर्थ ही
धोते-पोंछते हैं । आखिर दुर्भाग्यरूप वर्षासे एक दिन यह देहरूप
घर गिर ही जाता है ।
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