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सर्वकोश
परशुराम कल्पसूत्र (महर्षि परशुराम - आचार्य विद्यानिवास मिश्र सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

परशुराम कल्पसूत्र (महर्षि परशुराम - आचार्य विद्यानिवास मिश्र सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Parasurama Kalpasutra with Vidya Niwas Mishra Commentary

भगवान् परशुराम (टीकाकार: प्रो. विद्यानिवास मिश्र) द्वारा

DevanagariHindipublished320 पृष्ठ

पृष्ठ 214, कुल 320 में से

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पृष्ठ 214

१७२ परशुरामकल्पसूत्रम्
१. अन्धे अन्धिनि नमः अङ्गुष्ठाभ्यां नमः,
२. रुन्धे रुन्धिनि नमः तर्जनीभ्यां नमः,
३. जम्भे जम्भिनि नमः मध्यमाभ्यां नमः,
४. मोहे मोहिनि नमः अनामिकाभ्यां नमः और
५. स्तम्भे स्तम्भिनि नमः कनिष्ठिकाभ्यां नमः बोलकर 'अस्त्राय फट्' तक मन्त्र
पूरा कर देना चाहिये। १ से ५ तक के सभी मन्त्र सात-सात अक्षरों के हैं।
इसीलिये इन्हें सप्तार्ण मन्त्र कहते हैं॥८॥
अथ हृदयादिन्यासः
वाङ्नमो भगवतीत्यारभ्य त्रयोदशभिर्हृदयं षड्भिः शिरः,
दशभिः शिखां, सप्तभिः सप्तभिः कवचनेत्रास्त्राणि विन्यस्य।।९।।
वागित्यारभ्य मूलमन्त्रत्रयोदशादिमवर्णैर्हृन्मन्त्रसहितैः शिखायाम्, तदग्रि-
सप्तवर्णैः कवचमन्त्रसहितैः नेत्रेषु, तदग्रिमसप्तवर्णैः अस्त्रमन्त्रसहितैः अस्त्रं च
विन्यसेत्। मन्त्रस्वरूपं यथा—ऐं ग्लौं ऐं नमो भगवति वार्त्तालि वार्त्तालि
हृदयाय नमः। एवमग्रेऽपि योज्यम्। इति हृदयादिषडङ्गन्यासः ॥९।।
हृदयादि न्यास का विधान इस सूत्र में दिया गया है। सर्वप्रथम द्वितारी
का प्रयोग कर सूत्र के अनुसार वाग्बीज 'ऐं' का उच्चारण करना चाहिये। पुनः
मूलमन्त्र के १३ वर्णों से हृदय में, छः वर्णों से शिर पर, दश वर्णों से शिखा
में, तथा सात-सात से कवच, नेत्र और अस्त्र में विन्यास होना चाहिये। मन्त्रों
का स्वरूप इस प्रकार होना चाहिये—
१. ऐं ग्लौं ऐं नमो भगवति वार्त्तालि वार्त्तालि हृदयाय नमः।
२. ऐं ग्लौं वाराहि वाराहि शिरसे स्वाहा।
३. ऐं ग्लौं वराहमुखि वराहमुखि शिखायै वषट्।
४. ऐं ग्लौं अन्धे अन्धिनि नमः कवचाय हुम्।
५. ऐं ग्लौं रुन्धे रुन्धिनि नमः नेत्रत्रयाय वौषट्।
६. ऐं ग्लौं जम्भे जम्भिनि नमः अस्त्राय फट्।
इस तरह मूल मन्त्र से हृदयादि न्यास का विधान सूत्रानुसार पूरा
होता है ॥९॥