परशुराम कल्पसूत्र (महर्षि परशुराम - आचार्य विद्यानिवास मिश्र सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Parasurama Kalpasutra with Vidya Niwas Mishra Commentary
भगवान् परशुराम (टीकाकार: प्रो. विद्यानिवास मिश्र) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंवाराहीक्रमः १६७
परशिवशक्तिमयी संविन्मयी पट्टमहिषी सिंहासनासीन राजराजेश्वरी ललिताम्बा की
दण्डनायिका माँ वाराही सर्वथा प्रणम्य और पूज्य हैं। दुष्टों को नियन्त्रित करने
और शिष्टों पर अनुग्रह करने के निरर्गल अधिकार से यह सम्पन्न हैं। अन्यानपेक्षा
आज्ञा के अधिकार से यह सम्पन्न हैं। अन्यानपेक्षा आज्ञा की अधिकारिणी कोल
के समान मुखवाली माँ वाराही की उपासना करनी चाहिये। यह अत्यन्त
रहस्यमयी समयसङ्केता विद्या है।।१।।
तत्र कथंभावाकाङ्क्षायामाह
तत्रायं क्रमो महारात्रे बुद्ध्वा स्वहृदयपरमाकाशे ध्वनन्त-
मनाहतध्वनिमूर्जितानन्ददायकमवमृश्य ।।२।।
तत्र वाराह्युपास्तावायं क्रमः प्रकारः। महारात्रे इति। धूर्त्तस्वामिभाष्ये
महारात्रिस्त्रिभागावशिष्टा रात्रिः। यद्वा महारात्रिः निशीथः। 'महारात्रिसमुत्पन्नः
कृष्णो गोपालनन्दनः' इति ब्रह्मवैवर्त्तात्। कृष्णजन्मार्धरात्रे इति प्रसिद्धत्वात्।
तस्मिन् समये बोधोत्तरकालीनक्रियामाह—स्वहृदयेति। स्वहृदयरूपो यः परम
उत्कृष्ट आकाशस्तस्मिन् ध्वनन्तं शब्दं कुर्वन्तम् अनाहतस्य द्वादशदल-
कमलस्य ध्वनिं कराभ्यां कर्णपिधाने श्रूयमाणे यः शब्दः सोऽनाहतशब्द
इत्युच्यते। स मध्यरात्रे कर्णपिधानाभावेऽपि अनुभूयते। कथंभूतम्? ऊर्जितः
सिद्धो य आनन्दस्तस्य दायकम्। अभिव्यञ्जकम् अवमृश्य अनुसन्धाय कञ्चित्
कालं श्रुत्वेत्यर्थः ।।२।।
वाराही की उपासना का यह निर्धारित क्रम है। 'महारात्र' एक योगरूढ
शब्द है। 'धूर्त्तस्वामी' नामक भाष्यकार ने इसके भाष्य के सन्दर्भ में 'महारात्र'
का एक विग्रह प्रस्तुत किया था। उसके अनुसार त्रिभागावशिष्ट रात्रिकाल ही
महारात्र मानना चाहिये। रात्रि की बारह घड़ी के समय को तीन भागों में बाँटने
पर और आठ घड़ी बीत जाने पर शेष चार घड़ी रात को महारात्र की संज्ञा
दी जाती है।
एक दूसरा अर्थ भी अभिप्रेत है। अर्धरात्रि को निशीथ कहते हैं। यह
निशीथ काल ही महारात्र काल है। ब्रह्मवैवर्त्तपुराण में यह उल्लेख है कि, भगवान्
श्रीकृष्ण महारात्रिकाल में उत्पन्न हुए थे। यह लोकप्रसिद्ध सत्य है। जन्माष्टमी