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सर्वकोश
परशुराम कल्पसूत्र (महर्षि परशुराम - आचार्य विद्यानिवास मिश्र सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

परशुराम कल्पसूत्र (महर्षि परशुराम - आचार्य विद्यानिवास मिश्र सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Parasurama Kalpasutra with Vidya Niwas Mishra Commentary

भगवान् परशुराम (टीकाकार: प्रो. विद्यानिवास मिश्र) द्वारा

DevanagariHindipublished320 पृष्ठ

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पृष्ठ 207

श्यामाक्रमः १६५
इक्षुखण्डमित्यनेन तद्विकाराणाम् गुडशर्करादीनाम् अदोषः सूचितः।
वार्त्तालीं वाराहीम्। सिद्धद्रव्याणि मपञ्चकरूपाणि न जुगुप्सेत। स्वमनसाऽपि न
निन्द्याद् निष्ठुरतां नासिकाच्छेदनादि। वीरस्त्रियमिति षष्ठीतत्पुरुषः, न
कर्मधारयः। न तं हन्याद् इत्यत्र पुंस्त्वस्यानन्वयानुपपत्तेः। तं वीरं। तद्द्रव्यं
वीरद्रव्यम्। आत्मेच्छया स्वेन्द्रियतृप्तये। उररीकुर्यात् स्वीकुर्यात्। अप्रति-
सम्भाषमाणः प्रत्युत्तरमदत्त्वा कुलपुस्तकानि कुलशास्त्रपुस्तकानि।।३९।।
।। इति श्रीपरशुरामकल्पसूत्रे श्रीरामेश्वरनिर्मितायां सौभाग्योदयनाम्न्यां
श्रीपरशुरामकल्पसूत्रवृत्तौ (मुख्यांशमात्रायां) श्यामाक्रमो
नाम षष्ठः खण्डः सम्पूर्णः ।।६।।
ललितोपासक के आचार—
१. ऊख (गन्ना) न चूसे। २. दिन में वाराही का स्मरण न करे। ३.
मपञ्चक द्रव्यों की निन्दा न करे। ४. स्त्रियों के प्रति निष्ठुर न बने। नाक, कान
आदि का छेदन न करे। ५. वीरों की स्त्रियों को सहतल्पभागी न बनाये। वीर-
वध न करे। वीर द्रव्यों का अपहरण न करे। ६. अपनी इन्द्रियतृप्ति के लिये
मपञ्चक का उपयोग न करे। ७. कुलाचारहीन व्यक्ति के साथ कभी न रहे। ८.
बक बक न करे। ९. एक स्त्री बात करना चाहे या कर रही हो, तो उससे
स्वयं भी बातें करें। १०. कुल-पुस्तकों की रक्षा करे। ये आचार अत्यन्त
आवश्यक और अनिवार्य हैं। ललितोपासक को इन नियमों को मनोयोगपूर्वक
निभाना चाहिये।।३९।। इति शिवम् ।।
।। श्रीरामेश्वरकृत मुख्यांश-सौभाग्योदयवृत्तिसहित
डॉ. परमहंसमिश्रकृत नीर-क्षीर-विवेक भाषा-भाष्य-समन्वित
श्रीपरशुरामकल्पसूत्र का श्यामाक्रम नामक षष्ठ खण्ड परिपूर्ण ।।६।।
।। शुभं भूयात् ।।