परशुराम कल्पसूत्र (महर्षि परशुराम - आचार्य विद्यानिवास मिश्र सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Parasurama Kalpasutra with Vidya Niwas Mishra Commentary
भगवान् परशुराम (टीकाकार: प्रो. विद्यानिवास मिश्र) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१६४ परशुरामकल्पसूत्रम्
एव जपसमाप्तौ पूजानिवृत्तिः। लक्षजपं जप्त्वेति लक्षसंख्याविशिष्टजपोऽनेन
विधीयते। तद्दशांशक्रमेण होमो जपदशांशं, तद्दशांशं तर्पणम्, तद्दशांशं
ब्राह्मणभोजनम् ।।३७।।
सूत्रकार का यह निर्देश है कि, सपर्या नित्य करनी चाहिये। तदनन्तर
जप का विधान है। जप की संख्या भी एक लाख होनी चाहिये। ऐसा निर्देश
है। इस सन्दर्भ में यह ध्यान देना आवश्यक है कि, पूजा प्रधान नहीं होती।
प्रधान जप होता है और पूजा उसकी अङ्ग होती है। एक लाख जप, दश हजार
होम, १ हजार तर्पण और सौ ब्राह्मण भोजन का क्रम अपनाना चाहिये। श्यामा
मन्त्र जप करने वाले के लिये विशेष आचार पालन की भी पद्धति अपनानी
चाहिये ।।३७।।
अथैतन्मनुजापिधर्मानाह
एतन्मनुजापी न कदम्बं छिन्द्यात्, गिरा कालीति न वदेत्।
वीणावेणुनर्त्तन-गायन-गाथा-गोष्ठीषु च न पराङ्मुखो गच्छेत्।
गायकं न निन्द्यात् ।।३८।।
एते धर्मा न जपसमकालिकाः किन्तु जपमारभ्य यावज्जीवम् ।।३८।।
श्यामा मन्त्र जपकर्त्ता आरम्भ काल से जीवनपर्यन्त करे। वह कदम्ब वृक्ष
न काटे। 'काली' शब्द का उच्चारण मुख से न करे। वीणा, वंशा, मूर्च्छना,
नृत्य, संगीत, गाथा, गोष्ठी में रुचि ले। गायक और गायन की कभी निन्दा
न करे।।३८।।
एवं श्यामोपासकानां धर्मानुक्त्वा प्रसङ्गात् ललितोपासकधर्मानप्याह
ललितोपासको नेक्षुखण्डं भक्षयेत्, न दिवा स्मरेद् वार्त्तालीं,
न जुगुप्सेत सिद्धद्रव्याणि, न कुर्यात् स्त्रीषु निष्ठुरतां, वीरस्त्रियं न
गच्छेत्। न तां हन्यात्, न तद्द्रव्यमपहरेत्। नात्मेच्छया मपञ्चक-
मुररीकुर्यात्, कुलभ्रष्टैः सह नासीत, न बहु प्रलपेत्, योषितं
सम्भाषमाणामप्रतिसम्भाषमाणो न गच्छेत्, कुलपुस्तकानि गोपायेत्।
इति शिवम् ।।३९।।