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परशुराम कल्पसूत्र (महर्षि परशुराम - आचार्य विद्यानिवास मिश्र सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

परशुराम कल्पसूत्र (महर्षि परशुराम - आचार्य विद्यानिवास मिश्र सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Parasurama Kalpasutra with Vidya Niwas Mishra Commentary

भगवान् परशुराम (टीकाकार: प्रो. विद्यानिवास मिश्र) द्वारा

DevanagariHindipublished320 पृष्ठ

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पृष्ठ 204

१६२ परशुरामकल्पसूत्रम्
बलिदानप्रकारं दर्शयति
शुद्धजलेन त्रिकोणवृत्तचतुरस्रं विधायार्धान्नपूर्णसलिलसादि-
मोपादिममध्यमं सु(स)गन्धपुष्पं साधारं पात्रं निधाय ।।३४।।
शुद्धजलेन कलशस्थेन। अर्धान्नपूर्णं सलिलं यस्मिंस्तत्। आदिमं
प्रथमम्। उपादिमं द्वितीयं, मध्यमं तृतीयम्, एभिः सहितं सुगन्धपुष्पं यत्र,
ईदृशम् आधारसहितं बलिपात्रं निधाय स्थापयित्वा ।।३४।।
यहाँ शुद्ध जल से ही मण्डल-प्रकल्पन कर लेना चाहिये। कलशस्थित
जल ही शुद्ध जल माना जाता है। इसकी सामान्य पुष्पविकीर्णन से अर्चना करने
के उपरान्त साधार पात्र की स्थापना करे। उस पात्र को आधा अन्न और आधा
जल से आपूरित कर उस पात्र में गन्ध, पुष्प आदि का प्रक्षेप करे, जिससे
वहाँ का वातावरण आकर्षक और मनोहारी प्रतीत हो। जहाँ तक पात्र का प्रश्न
है, उसके सम्बन्ध में आदिम, उपादिम और मध्य शब्दों का पात्र के विशेषण
रूप में प्रयोग सूत्र में दिया गया है। अर्थात् तीन बलिपात्र अपेक्षित हैं।।३४।।
बलिदानमन्त्रान् तदितिकर्त्तव्यतां च दर्शयति
श्रीमातमुक्त्वा गीश्वरीमं बलिं गृह गृह हुं फट् स्वाहा।
श्रीमातमुक्त्वा गीश्वरि शरणागतं मां त्राहि त्राहि हुं फट् स्वाहा।
क्षेत्रपालनाथेमं बलिं गृह गृह फट् स्वाहा। इति मन्त्रत्रयेण
वामपाष्णिघातकरास्फोटसमुदञ्चित-वक्त्रनाराच-मुद्राभिः बलिं
प्रदाय ।।३५।।
श्रीमातमिति हुंफट् स्वाहेत्यन्तं मन्त्रत्रयम्। नाराचमुद्रा प्रसिद्धा ।।३५।।
१. प्रथम मन्त्र—ऐं क्लीं सौः श्रीमातङ्गीश्वरि इमं बलिं गृह गृह हुं फट् स्वाहा।
२. दूसरा मन्त्र—ऐं क्लीं सौः श्रीमातङ्गीश्वरि शरणागतं मां त्राहि त्राहि हुं फट्
स्वाहा।
३. तीसरा मन्त्र—ऐं क्लीं सौः क्षेत्रपाल नाथ इमं बलिं गृह गृह हुँ फट् स्वाहा।
इन मन्त्रों का क्रमशः पाठ करते हुए देवी के दक्षिण भाग में इन तीन
बलियों को अर्पित करना चाहिये। फिर बलि को दूध से नहलाना चाहिये। फिर