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सर्वकोश
परशुराम कल्पसूत्र (महर्षि परशुराम - आचार्य विद्यानिवास मिश्र सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

परशुराम कल्पसूत्र (महर्षि परशुराम - आचार्य विद्यानिवास मिश्र सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Parasurama Kalpasutra with Vidya Niwas Mishra Commentary

भगवान् परशुराम (टीकाकार: प्रो. विद्यानिवास मिश्र) द्वारा

DevanagariHindipublished320 पृष्ठ

पृष्ठ 203, कुल 320 में से

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पृष्ठ 203

श्यामाक्रमः १६१
हंसमूर्त्ति, परप्रकाश, पूर्ण, नित्य और करुण गुरु सम्प्रदाय प्रवर्त्तक गुरु
हैं। द्वन्द्व समास के अन्त में सम्प्रदाय गुरु शब्द का प्रयोग सभी के साथ लगाने
का नियम है। मन्त्र का उदाहरण सूत्रानुसार 'हंसमूर्त्ति-सम्प्रदाय-गुरुश्रीपादुकां
पूजयामि नमः' इस प्रकार का होगा। इसमें भी त्रितारी और कुमारी प्रयोग किया
जा सकता है। तर्पयामि शब्द का प्रयोग भी परम्परा में है।।३१।।
एवं चक्रपूजां समाप्य गुरुपादुकापूजामाह
स्वशिरसि सामान्यविशेषपादुके अभ्यर्चयेत् ।।३२।।
सामान्यगुरुपादुकामन्त्रो दीक्षाखण्डे प्रतिपादितः। विशेषगुरुपादुकामन्त्रः
चरमखण्डे श्यामागुरुपादुके(सू.४४)त्युद्धृतः। ताभ्यां मन्त्राभ्यां स्वशिरसि
पादुकाद्वयं पूजयेत् ।।३२।।
गुरुदेव की चरणपादुकायें अभिव्यक्त रहस्यमयी शक्तियाँ मानी जाती हैं।
इन्हें अपने शिर पर रखने से और सामान्य-विशेष मन्त्रमय पूजन से शिष्य के
शरीर में दिव्यता का सञ्चार होता है। सामान्य मन्त्र का उल्लेख दीक्षा-खण्ड
के सूत्र ४१ में वर्णित है।
सामान्य पादुका मन्त्र में त्रितारी कुमारी और ऐं ग्लौं इतना जोड़कर
'हस्खफ्रें हसक्षमलवरयूं सहक्षमलवरयीं हसौः सहौः, मन्त्र बोलते हैं। विशेष पूजा
में त्रितारी 'ऐं ग्लौं' नहीं लगाते हैं। इस पर ध्यान देना चाहिये ।।३२।।
एवं गुरुपादुकार्चना-आवरणपूजामुक्तवा प्रधानदेवतापूजापुरःसरं बलिदानं
विवृणोति
पुनर्देवीमभ्यर्च्य बालया षोडशोपचारान् विधाय ।।३३।।
मूलेनेति शेषः। पुनरित्यनेन षडङ्गदेवताभ्यः प्राक् प्रधानदेव्यर्चनं
ज्ञापितम्। बालयेति स्पष्टम् ।।३३।।
आवरणपूजा और गुरुपादुका-पूजा के बाद पुनः देवी श्यामा की पूजा
करनी चाहिये। बाला मन्त्र से षोडशोपचार पूजन का क्रम अपनाना विधिविहित
है। षोडशोपचार में पाद्यार्घ्याचमनीय, स्नान, वस्त्र, गन्ध, पुष्प, धूप, दीप,
नैवेद्य, ताम्बूल, नीराजन, छत्र, चामर, दर्पण, आभूषण गृहीत हैं।।३३।।