परशुराम कल्पसूत्र (महर्षि परशुराम - आचार्य विद्यानिवास मिश्र सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Parasurama Kalpasutra with Vidya Niwas Mishra Commentary
भगवान् परशुराम (टीकाकार: प्रो. विद्यानिवास मिश्र) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१६० परशुरामकल्पसूत्रम्
क्रमस्तु आग्नेयकोणमारभ्यैशानान्तकोणे इति सप्तमावरणम् ॥२९॥
सातवें आवरण में चतुरस्र के अग्निकोण से 'ऐं क्लीं सौः गं गणपति-
श्रीपादुकां पूजयामि तर्पयामि नमः' ऐसे गणपति मन्त्र से गणपति की पूजा करनी
चाहिये। इसी तरह निऋति में 'दुं' बीज सहित दुर्गा की, वायव्य में बं बीज
सहित बटुक की और ईशान में 'क्षं' बीज सहित क्षेत्रपाल की पूजा करनी
चाहिये। यह सप्तमावरण की पूजा मानी जाती है॥२९॥
श्रीक्रमे तत्रान्तरे आम्नायादिदेवतावद् आवरणबहिर्भूतदेवतायजनमाह
'सां सरस्वत्यै नमः' इति प्रभृति 'वास्तुपतये ब्रह्मणे नमः'
इति-पर्यन्तं पुनस्तत्रैवाभ्यर्च्य ॥३०॥
तत्रैवेति पूर्वं यत्र न्यासोत्तरं पूजितास्तत्र तैरेव मन्त्रैः श्रीपादुकां पूजयामि
नमःसहितैः, यथा—सां सरस्वत्यै नमः सरस्वतीश्रीपादुकां पूजयामि नम इति।
एवमग्रेऽपि नमःपदान्ते श्रीपादुकामिति योगस्तु सूत्रे नमोऽन्तानुकरणेन
सूचितः ॥३०॥
इसी क्रम के सूत्र १४ में पहले सरस्वती, लक्ष्मी, शङ्खनिधि, पद्मानिधि,
इन्द्र, अग्नि, यम, निऋति, वरुण, वायु, सोम, ईशान, ब्रह्मा, विष्णु और
वास्तुपति की एकादश दिशाओं की पूजा का उल्लेख है। उसी क्रम को यहाँ
भी अपनाना चाहिये॥३०॥
श्रीश्यामाविद्याप्रवर्त्तकाचार्यपूजां तेषां स्थानान्याह
हंसमूर्त्तिपरप्रकाशपूर्णनित्यकरुणसम्प्रदायगुरूँश्चतुरस्रपूर्वरिखा-
यामभ्यर्च्य ॥३१॥
हंसमूर्त्तिश्च, परप्रकाशश्च, पूर्णश्च, नित्यश्च, करुणश्च ये ते
सम्प्रदायगुरुवस्तान् चतुरस्रपूर्वरिखायाम्। उदगपवर्गं पूजयेद् इति तदर्थः।
मन्त्रस्वरूपञ्च 'हंसमूर्त्तिसम्प्रदायगुरुश्रीपादुकां पूजयामि। एवमग्रिममन्त्रेष्वपि
सम्प्रदायगुरु इति योज्यम्, द्वन्द्वान्ते श्रूयमाणं प्रत्येकं सर्वत्र सम्बन्ध्यत इति
न्यायात् ॥३१॥