परशुराम कल्पसूत्र (महर्षि परशुराम - आचार्य विद्यानिवास मिश्र सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Parasurama Kalpasutra with Vidya Niwas Mishra Commentary
भगवान् परशुराम (टीकाकार: प्रो. विद्यानिवास मिश्र) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंश्यामाक्रमः १५९
पञ्चमावरणदेशादीनाह
अष्टदले असिताङ्ग-रुरु-चण्ड-क्रोधन-उन्मत्त- कलाप-भीषण-
संहाराः सदण्डिस्वरयुग्मादिसंयुक्ता भैरवान्ताश्च भावनीयाः ॥२७॥
सदण्डीत्यत्र दण्डी अनुस्वारः 'दण्डी पञ्चदशः शून्यः' इति मेदिनी-
कोशात्। अनुस्वारेण सहिता ये पूर्वोक्तस्वरयुग्मादय आदौ तैर्युक्त्वा भैरवान्ताश्च
ये मन्त्रास्तैः पूज्या इत्यर्थः। यथा अं असिताङ्गभैरवश्रीपादुकां पूजयामि।
एवमेवाग्रिमसप्तमन्त्रा ऊह्याः। इति पञ्चमावरणम् ॥२७॥
दूसरे अष्टदल कमल के दलों पर सदण्डि अर्थात् अनुस्वारयुक्त षोडश
स्वरों के युग्म-युग्म भाग के आदि अक्षरों के साथ भैरवदेवों की पूजा का विधान
है। उदाहरण रूप प्रथम मन्त्र—'ऐं क्लीं सौः अं असिताङ्ग'भैरवश्रीपादुकां
पूजयामि तर्पयामि नमः' इस प्रकार का बनेगा। इसी प्रकार इं रुरु, उं चण्ड,
ऋं क्रोध, लूं उन्मत्त, एं कपाल, ओं भीषण, अं संहार भैरव के मन्त्रों का भी
ऊहन करना चाहिये ॥२७॥
षष्ठावरणदेवतामन्त्रादीनाह
चतुर्दलं मायूक्ततङ्गी सिद्धलक्ष्मीश्च महामायुक्ततङ्गी महासिद्ध-
लक्ष्मीश्च ॥२८॥
उभयत्रयुक्तेति ज्ञेयम्। तथा च मातङ्गी महामातङ्गीति सिद्धम्। शेषं
स्पष्टम्। मातङ्गी सिद्धलक्ष्मी, महामातङ्गी महासिद्धलक्ष्म्यश्चतस्रः पूज्या इति
विवेकः। इति षष्ठावरणम् ॥२८॥
इस आवरण-पूजन में केवल चार देवियों की पूजा त्रितारी के साथ की
जाती है। चार दलों पर चार देवियों की पूजा करनी चाहिये। उदाहरणस्वरूप
मन्त्र 'ऐं क्लीं सौः मातङ्गीश्रीपादुकां पूजयामि तर्पयामि नमः' बनता है। इसी तरह
सिद्धलक्ष्मी, महामातङ्गी, और महासिद्धलक्ष्मी पूजन का भी विधान है। यह छठें
आवरण की पूजा है। ॥२८॥
सप्तमावरणपूजामाह
गंगणपति, दुंदुर्गा, बंबटुक, क्षंक्षेत्रपालाः चतुरस्रे
सम्पूज्याः ॥२९॥