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परशुराम कल्पसूत्र (महर्षि परशुराम - आचार्य विद्यानिवास मिश्र सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

परशुराम कल्पसूत्र (महर्षि परशुराम - आचार्य विद्यानिवास मिश्र सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Parasurama Kalpasutra with Vidya Niwas Mishra Commentary

भगवान् परशुराम (टीकाकार: प्रो. विद्यानिवास मिश्र) द्वारा

DevanagariHindipublished320 पृष्ठ

पृष्ठ 200, कुल 320 में से

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१५८ परशुरामकल्पसूत्रम्
है। सोलह स्वरों में आठ स्वर युग्म (अर्थात् युगल या जोड़ा) होते हैं। इन
स्वरयुगलों के अन्त आठ 'आ' 'ई' 'ऊ' 'ॠ' 'लॄ' 'ऐ' 'औ' और 'अः' यदि
अनुस्वारयुक्त हो जाँय, तो 'आं' 'ईं' 'ऊं' 'ॠं' लॄं' 'ऐं' 'औं' और 'अंः' ये
आठ दीर्घ सेन्दु स्वर होते हैं। एक-एक शक्तियों के साथ लगाकर मन्त्र बनाने
का निर्देश सूत्रकार देते हैं। इसी क्रम में सूत्रनिर्दिष्ट आठों देवियों की पूजा भी
करनी चाहिये। उदाहरणरूप एक ब्राह्मी देवी का मन्त्र इस प्रकार बनाना
चाहिये—
१. 'ऐं क्लीं सौः 'आं' ब्राह्मीश्रीपादुकां पूजयामि तर्पयामि नमः'। इसी तरह अन्य
सात देवियों के क्रमिक मन्त्र बनते हैं।
२. लक्ष्मी आदि उपदेवियों के लिये उदाहरणरूप एक मन्त्र इस प्रकार बनता
है—'ऐं क्लीं सौः लक्ष्मीश्रीपादुकां पूजयामि तर्पयामि नमः'। गुह्य मन्त्र से
लक्ष्मी की पूजा होती है। इसी तरह क्रमशः सातों की पूजा सम्पन्न होती
है। यह तृतीयावरण पूजा है॥२५॥
चतुर्थावरणपूजास्थानान्याह
षोडशदले वामा-ज्येष्ठा-रौद्री-शान्ति-श्रद्धा-सरस्वती-क्रिया-
शक्ति-लक्ष्मी-सृष्टि-मोहिनी-प्रमथिनी-आश्वासिनी-वीची-विद्युन्-
मालिनी-सुरानन्दा-नागबुद्धिकाः ॥२६॥
अत्र क्रियाशक्तिः, विद्युन्मालिनी, सुरानन्दा इत्येकैका देवताः। शेषा
देवताः स्पष्टाः। क्रमस्यानुक्तत्वाद् देव्यग्रदलमारभ्य प्रादक्षिण्येन। इति
चतुर्थावरणम् ॥२६॥
सोलह दल वाले कमलों के दलों पर यह पूजा की जाती है। क्रम अनुक्त
होने के कारण देवी के अग्रदल से दक्षक्रम से पूजा प्रारम्भ की जाती है।
क्रियाशक्ति, विद्युन्मालिनी और सुरानन्दा एक-एक देवी के ही नाम हैं। इनकी
पूजा के लिये उदाहरणरूप एक मन्त्र इस प्रकार है—'ऐं क्लीं सौः वामा
श्रीपादुकां पूजयामि तर्पयामि नमः'। इसी तरह १६ देवियों के सोलह मन्त्रों से
चौथे आवरण की पूजा पूरी होती है॥२६॥