परशुराम कल्पसूत्र (महर्षि परशुराम - आचार्य विद्यानिवास मिश्र सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Parasurama Kalpasutra with Vidya Niwas Mishra Commentary
भगवान् परशुराम (टीकाकार: प्रो. विद्यानिवास मिश्र) द्वारा
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“एकाकी न रमते तदात्मानं व्याकरोत्” अकेले रमना संभव नहीं है, इसलिए
अपने को विभक्त किया। इसलिए यहाँ माया से उद्वेग नहीं है, न माया का
निरसन है, बल्कि माया का अतिक्रमण है। यह अतिक्रमण मायिक मार्गों में
रहते हुए ही होता है। इसलिए अद्वैत में प्रवेश के लिए संसार का त्याग
आवश्यक नहीं है। संसार का संस्कार आवश्यक है। प्रायः यह शंका की जाती
है कि, कैसे दो प्रकार की बातें आदि शंकर कहते हैं। एक ओर संसार का
तिरस्कार, दूसरी ओर संसार का स्वीकार। एक ओर निष्कल परब्रह्म का ध्यान,
दूसरी ओर कामेश्वर-कामेश्वरी के सम्मेलन का ध्यान। पर ध्यान से देखने पर
इसमें विरोध नहीं है। उपासना के लिए द्वैत की परिकल्पना अपरिहार्य है।
उपासना की समाप्ति में समर्पण में द्वैत का भी समर्पण हो जाता है। जो यह
बोध होता है कि, मैं ब्रह्म हूँ, जो कुछ है, वह सब ब्रह्म ही है और यह अनुभव
करने वाला मैं इस ब्रह्म के साथ ऐक्य का अनुभव करने वाला मैं अपने को
आहुति के रूप में सौंप रहा हूँ अर्थात् जिस सर्वात्म भाव का मुझे दर्शन मिला
है, वह दर्शन भी मेरा अकेला न रहे, वह सबका हो जाए। अर्थात् सर्वभाव
का अनुभव करने वाला भी दूसरों को अनुभव हो। इसलिए अपने को अनुभव
की परम्परा में खपा देता है। यही गूढ़ तत्त्व है।
साधक में अहंकार के क्षरण के लिए यह आवश्यक है कि, वह यह अनुभव
करे कि, हमारे पूर्व गुरुओं ने अपने अनुभव को अपने पूर्ववर्ती गुरुओं के अनुभव
के साथ जोड़कर अपने को उसी अनुभव में विलीन कर दिया है। इसलिए मैं
उस कड़ी में जुड़ता हूँ तो स्वयं भी विलीन होने के लिए। इसका उद्देश्य यह
है कि, साधना का अहंकार किसी भी साधक के मन में न रहे। उसको बराबर
अनुभव हो कि, साधना में निरन्तर परिष्कार करते रहने वाली गुरु परम्परा कारक
रही है। जिस प्रकार श्राद्ध करते समय अपने पूर्व की तीन पीढ़ियों को पिण्ड
देते हैं और इसके द्वारा वंश परम्परा की श्रृंखला को अविच्छिन्न रखते हैं, उसी
प्रकार गुरु, परम गुरु (गुरु के गुरु), परमेष्ठि गुरु (गुरु के गुरु के गुरु) इन तीन
गुरुओं की चरण वन्दना की जाती है ताकि विद्या परम्परा की अविच्छिन्नता साधक
तक आए और साधक से उसके आगे जाए। उसका एक यह भी अभिप्राय होता
है कि, पूर्व अनुभवों के साथ जुड़ने पर अपना अनुभव बड़ा भी हो जाता है
और अहंकार का विसर्जन भी होता है।