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परशुराम कल्पसूत्र (महर्षि परशुराम - आचार्य विद्यानिवास मिश्र सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

परशुराम कल्पसूत्र (महर्षि परशुराम - आचार्य विद्यानिवास मिश्र सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Parasurama Kalpasutra with Vidya Niwas Mishra Commentary

भगवान् परशुराम (टीकाकार: प्रो. विद्यानिवास मिश्र) द्वारा

DevanagariHindipublished320 पृष्ठ

पृष्ठ 15, कुल 320 में से

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पृष्ठ 15

पुरोवाक्
श्रीविद्या उपासना के तीन मुख्य आकर ग्रन्थ हैं—परशुरामकल्पसूत्र,
प्रपंचसारतन्त्र और सौन्दर्यलहरी। इनमें प्रपंचसारतन्त्र और सौन्दर्यलहरी आद्य
शंकराचार्य की कृतियाँ हैं। परशुरामकल्पसूत्र इनके पूर्व का है। पूरे आकर ग्रन्थों
का विभाजन श्रीविद्यार्णव नामक ग्रन्थ में किया गया है। पूज्य स्वामी करपात्री
जी ने श्रीविद्यार्णव से ही अपने देश-काल के अनुरूप श्रीविद्यारत्नाकर ग्रन्थ की
रचना की और सम्पादन का भार पूज्य श्री सीताराम कविराज 'जी. को दिया।
श्रीविद्यावरिवस्या इसी का लघु रूप है। परशुरामकल्पसूत्र का महत्त्व केवल
श्रीविद्या का आद्य ग्रन्थ होने के कारण ही नहीं है, इसलिए भी है कि इस
विद्या की गुरु. परम्परा में उनका नाम बहुत ऊपर आता है। एक तरह से वे
श्रीविद्या की उपासना की दो धाराओं को वशिष्ठ द्वारा प्रवर्तित और दुर्वासा द्वारा
प्रवर्तित मिलाकर समग्र धारा के प्रवर्तक माने जाते हैं। जिस रूप में यह ग्रन्थ
है, उसकी प्राचीनता में सन्देह कोई करे भी पर परशुराम के द्वारा प्रवर्तन की
बात सभी श्रीविद्या परम्परा के विद्वानों को मान्य है।
परशुरामकल्पसूत्र का सिद्धान्त त्रैपुर सिद्धान्त कहा जाता है। त्रैपुर सिद्धान्त
का अभिप्राय यह है कि सृष्टि, स्थिति, लय; इच्छाशक्ति, ज्ञानशक्ति और
क्रियाशक्ति—इन त्रिपुटियों को समेटने वाली त्रिपुर शक्ति है। इसी की अभिव्यक्ति
वामा, ज्येष्ठा और रौद्री रूपों में होती है। इन्हीं को क्रमशः सृष्टि, स्थिति, संहार
भी कह सकते हैं। यही त्रिपुरा शक्ति अपने शुद्ध परात्पर रूप में महात्रिपुरसुन्दरी
शक्ति है। उसी का विलास यह प्रपंच दिखता है, विलीन हो जाता है।
श्रीविद्या साधना मूलतः सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड में व्याप्त महाशक्ति की शिव
के साथ समरसता की ही साधना है। जिस तत्त्व की साधना है, वह तत्त्व
शिवशक्त्यैक्य रूप है। सिद्धान्त स्तर पर यह गूढ़ तादात्म्य की ही साधना है।
द्वैत से अन्तर केवल इतना है कि, द्वैत कल्पित होते हुए भी श्रीविद्या साधना
में अद्वैत प्राप्ति के लिए यह आवश्यक है। उपनिषदों में भी यह संकेत है कि,