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पराशर स्मृति (माधवाचार्य भाष्य व हिन्दी अनुवाद सहित)

पराशर स्मृति (माधवाचार्य भाष्य व हिन्दी अनुवाद सहित)

Parashara Smriti with Madhavacharya Bhashya & Hindi Translation

by महर्षि पराशर

Source: ठाकुरप्रसाद एण्ड संस वाराणसी · ठाकुरप्रसाद एण्ड संस वाराणसी (origin)

DevanagariSanskritpublished170 pages

Page 54 of 170

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Page 54

४२ पाराशरस्मृतिः [ चतुर्थो-
इस प्रकार पुत्र तीन प्रकार के होते हैं : १ औरस (अपनी सजा-
तीय भार्या में स्वपति से उत्पन्न), २. क्षेत्रज (दूसरे की स्त्री में उपपति
से उत्पन्न हुआ पुत्र) तथा ३. दत्तक पुत्र, जिसे कृत्रिम भी कहते हैं।
जिसे माता-पिता अपनी इच्छा से दे दें वह उसका दत्तक (कृत्रिम) पुत्र
हो जाता है ॥२४॥
परिवित्तिः परिवेत्ता यया च परिविद्यते ।
सर्वे ते नरकं यान्ति दातृयाजकपञ्चमाः ॥२५॥
१. परिवित्ति, २. परिवेत्ता, ३. परिवेत्ता से ब्याही गयी कन्या,
४. परिवेत्ता को कन्यादान करनेवाला दाता तथा ५. परिवेत्ता से
कन्या का विवाह करनेवाला ब्राह्मण ये पाँचों नरक में जाते हैं। (बड़े
भाई के रहते हुए जिसने अपना विवाह कर लिया वह 'परिवेत्ता' तथा
उसका बड़ा भाई 'परिवित्ति' कहा जाता है) ॥२५॥
द्वौ कृच्छ्रौ परिवित्तेस्तु कन्यायाः कृच्छ्र एव च ।
कृच्छ्रातिकृच्छ्रौ दातस्तु होता चान्द्रायणं चरेत् । २६ ।।
'परिवित्ति' को दो कृच्छ्र व्रत करना चाहिए। कन्या को एक कृच्छ्र
व्रत, दाता को कृच्छ्र तथा अतिकृच्छ्र व्रत तथा विवाह करानेवाले को
'चान्द्रायण' व्रत करना चाहिए। ऐसा करने से उन्हें पाप नहीं
लगता ॥२६॥
कुब्ज-वामन-षण्ढेषु गद्गदेषु जडेषु च ।
जात्यन्धे बधिरे मूके न दोषः परिवेदने १ ॥२७॥
यदि जेठा भाई लँगड़ा, वामन, नपुंसक, तोतला बोलनेवाला, जड़,
जन्मान्ध, बधिर तथा गूँगा हो और उस अवस्था में छोटा भाई व्याह
कर ले तो वह 'परिवेत्ता' नहीं कहा जाता ॥२७॥
१. 'परिविन्दतः' इति ।