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पराशर स्मृति (माधवाचार्य भाष्य व हिन्दी अनुवाद सहित)

पराशर स्मृति (माधवाचार्य भाष्य व हिन्दी अनुवाद सहित)

Parashara Smriti with Madhavacharya Bhashya & Hindi Translation

by महर्षि पराशर

Source: ठाकुरप्रसाद एण्ड संस वाराणसी · ठाकुरप्रसाद एण्ड संस वाराणसी (origin)

DevanagariSanskritpublished170 pages

Page 53 of 170

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Page 53

ऽध्यायः ] भाषाटीकासहिता ४१
ब्रह्महत्या में जितना पाप लगता है उसका दूना पाप गर्भ के गिराने
से होता है, अतः उसका कोई प्रायश्चित्त नहीं है। इसलिए ऐसी स्त्री को
त्याग देना ही श्रेयस्कर है ॥२०॥
न कार्यमावसथ्येन नाऽग्निहोत्रेण वा पुनः ।
स भवेत् कर्मचाण्डालो यस्तु धर्मपराङ्मुखः ॥२१॥
जो पुरुष धर्म से विमुख है उसके आवसथ्य (स्नाताग्नि) और
अग्निहोत्र करने से कोई फल नहीं होता । वह तो कर्म से चाण्डाल
कहा जाता है ॥२१॥
१ओघ-वाताऽऽहृतं बीजं यस्य क्षेत्रे प्ररोहति ।
२क्षेत्री तल्लभते बीजं न बीजी भागमर्हति ॥२२॥
जिस प्रकार जल और वायु के वेग से किसी का बीज दूसरे के क्षेत्र
में उत्पन्न हो तो उस बीज का मालिक खेत का स्वामी होता है, बीज
का मालिक नहीं ॥२२॥
तद्वत् परस्त्रियाः३ पुत्रौ द्वौ सुतौ कुण्ड गोलकौ ।
पत्यौ जीवति कुण्डः स्यात् मृते भर्त्तरि गोलकः ॥२३॥
उसी प्रकार दूसरे की स्त्री में दूसरे से उत्पन्न हुआ पुत्र उस स्त्री के
स्वामी का ही होता है, उपपति का नहीं । इस प्रकार दूसरे के क्षेत्र में
उपपति से उत्पन्न किये गये पुत्र के भी दो भेद हैं । प्रथम कुण्ड तथा
दूसरा गोलक । पति के जीते-जी उपपति के द्वारा स्त्री में उत्पन्न पुत्र
'कुण्ड' कहा जाता है और पति के मरने पर उपपति से उत्पन्न पुत्र
'गोलक' कहा जाता है ॥२३॥
औरसः क्षेत्रजश्चैव दत्तः कृत्रिमकः सुतः ।
दद्यान्माता पिता वाऽपि स पुत्रौ दत्तको भवेत् ॥२४॥
१. 'अम्बु इति । २. 'स क्षेत्री लभते' इति । ३. स्त्रियः' इति ।