पराशर स्मृति (माधवाचार्य भाष्य व हिन्दी अनुवाद सहित)
Parashara Smriti with Madhavacharya Bhashya & Hindi Translation
by महर्षि पराशर
Source: ठाकुरप्रसाद एण्ड संस वाराणसी · ठाकुरप्रसाद एण्ड संस वाराणसी (origin)
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३० पराशरस्मृतिः [ तृतीय-
शिल्पी ( चितेरा आदि ), कारुक ( रसोइया आदि ), वैद्य, दासी,
दास, नाई, राजा तथा श्रोत्रिय ( वेद-पाठी ) इन लोगों की स्नान
करने से ही शुद्धि हो जाती है ॥२२॥
सत्रतः मन्त्रपूतश्च आहिताग्निश्च यो द्विजः ।
राज्ञश्च सूतकं नास्ति यस्य चेच्छति पार्थिवः ॥२३॥
कृच्छ्र चान्द्रायणादि व्रतों को करनेवाले, यज्ञ में दीक्षा लेकर
पवित्र हुए, अग्निहोत्र करनेवाले ब्राह्मण तथा राजाओं को अशौच
नहीं लगता और राजा जिसे चाहे उसे भी अशौच नहीं लगता ॥२३॥
उद्यतो निधने दाने आर्त्तो विप्रो निमन्त्रितः ।
तदैव ऋषिभिर्दृष्टं यथाकालेन शुद्ध्यति ॥२४॥
संग्रामादि में मरने के लिए तैयार हुआ पुरुष, तथा दान देनेके
लिए उद्यत, आर्त्त ( रोगादि ग्रस्त ) और श्राद्ध में निमन्त्रित व्यक्ति
उतने काल के लिए शुद्ध हो जाता है, जितने काल तक उसका
प्रयोजन है, फिर उसकी अपने धर्मानुसार तत्तत् दिनों में शुद्धि
होती है ॥२४॥
प्रसवे गृहमेधी तु न कुर्यात् सङ्करं यदि ।
दशाहाच्छुध्यते माता त्ववगाह्य पिता शुचिः ॥२५॥
यदि गृहस्थ पुत्र आदि के जन्म होने पर प्रसूति का स्पर्श न करे तो
पिता उसी क्षण स्नान कर शुद्ध हा जाता है ( अर्थात् स्पर्श करने योग्य
हो जाता है, परन्तु कर्म करने का अधिकारी नहीं रहता ) । माता तो
दश दिन के अनन्तर ही शुद्ध होती है । दश दिन के पहले स्पर्श के
योग्य नहीं रहती ॥२५॥
सर्वेषां शावमाशौचं माता-पित्रोस्तु सूतकम् ।
सूतकं मातुरेव स्यादुपस्पृश्य पिता शुचिः ॥२६॥
Prof. Madhav Prasad Lamichhane Collection, Kathmandu, Nepal