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पराशर स्मृति (माधवाचार्य भाष्य व हिन्दी अनुवाद सहित)

पराशर स्मृति (माधवाचार्य भाष्य व हिन्दी अनुवाद सहित)

Parashara Smriti with Madhavacharya Bhashya & Hindi Translation

by महर्षि पराशर

Source: ठाकुरप्रसाद एण्ड संस वाराणसी · ठाकुरप्रसाद एण्ड संस वाराणसी (origin)

DevanagariSanskritpublished170 pages

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५ध्यायः ] भाषाटीकासहिता २९
बालक को दाँत आया हो अथवा न आया हो, यदि उसका
चूड़ाकरण संस्कार हो गया हो, तो अग्नि-संस्कार कर देने पर तीन
रात तक अशौच होता है ॥१८॥
आदन्तजन्मनः सद्यः अचूडान्नैशिकी स्मृता ।
त्रिरात्रमाव्रतादेशाद् दशरात्रमतः परम् ॥१९॥
अब उपर्युक्त स्थल में विशेषता कहते हैं—दाँत जमने तक बालक
की मृत्यु हो तो सद्यःशौच-तत्क्षण अर्थात् स्नान-मात्र से शुद्धि, दाँत
जमने के अनन्तर चूड़ाकरण होने तक मृत्यु हो जाने पर एक रात,
तथा चूड़ाकरण के अनन्तर व्रतबन्ध होने तक तीन दिन का एवं
व्रतबन्ध के अनन्तर मृत्यु हो जाने पर सपिण्ड को दश दिन का अशौच
लगता है ॥१९॥
ब्रह्मचारी गृहे येषां हूयते च हुताशनः ।
सम्पर्कं चेन्न कुर्वीत न तेषां सूतकं भवेत् ॥२०॥
जो ब्रह्मचारी हो अथवा जिसके घर में नित्य अग्निहोत्र होता हो
वे यदि अशौचवालों से खाने-पीने तथा स्पर्श आदि का सम्बन्ध न रखें
तो उन्हें अशौच नहीं लगता ॥२०॥
सम्पर्काद् दुष्यते विप्रो जनने मरणे तथा ।
सम्पर्कैषु¹ निवृत्तस्य न प्रेतं नैव सूतकम् ॥२१॥
ब्राह्मण तभी दोष का भागी होता है जब वह जननाशौच अथवा
मरणाशौच में सम्पर्क रखता है। यदि वह उपर्युक्त दोनों अवस्थाओं में
अशौचवालों से सम्पर्क न रखे तो उसे जननाशौच अथवा मरणाशौच
नहीं लगता ॥२१॥
शिल्पिनः कारुका वैद्या दासी-दासाश्च नापिताः ।
राजानः श्रोत्रियाश्चैव सद्यः शौचाः प्रकीर्तिताः ॥२२॥
१. सम्पर्काच्च' इति।