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पञ्चतन्त्रम् (संस्कृत मूल एवं भाषा टीका सहित)

Panchatantram with Sanskrit & Hindi Commentary

by पं. विष्णु शर्मा / पं. ज्वालाप्रसाद मिश्र

DevanagariSanskritpublished536 pages

प्रारंभिक पृष्ठ, कथामुख व कथासूची

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PANCHA TANTRA

BY

VISHNU SARMA

WITH A COMMENTARY

BY

Pandit Jwala Prasad Misra

HEAD PANDIT RAMESHWAR
SANSKRIT PATHSHALA
MORADABAD
AND
MAHOPADESHAK BHARAT DHARMA
MAHAMANDALA


Printed and Published

BY

KHEMRAJ SHRI KRISHNADAS

SHRI VENKATESHWAR STEAM
PRESS

BOMBAY.

1910


All rights reserved

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॥ श्रीः ॥

पञ्चतन्त्रम् ।

श्रीविष्णुशर्मसंकलितम् ।

मुरादाबादवास्तव्यकामेश्वरसंस्कृतपाठशालाप्रधाना-
ध्यापकसनातनधर्ममहोपदेशक-
पण्डितज्वालाप्रसादमिश्रविरचितनीतिसर्वस्वनाम्-
भाषाटीकासहितम् ।

तदेव

मुम्बय्यां
खेमराज-श्रीकृष्णदासश्रेष्ठिना
स्वकीये “श्रीवेङ्कटेश्वर” स्टीम्-मुद्रणयन्त्रालये
मुद्रयित्वा प्रकाशितम् ।

संवत् १९६६, शके १८३१.


इसका रजिस्टरी हक यन्त्रालयाध्यक्षने
स्वाधीन रक्खा है

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भूमिका।

भारतवर्ष जिस प्रकार अनेक विद्याओका भंडार है इसी प्रकार यहांकी नीतिप्रणाली भी अद्वितीय है, ससारमे रहकर जो नीतिशास्त्रसे वंचित हुआ है मानो उसने बहुत कुछ नहीं जाना और एक प्रकारसे मानो संसारमे उसका आगमन निरर्थक ही है, हमारे इस देशके पूर्वज महानुभाव दिव्यस्वभाव त्रिकालज्ञ महायोगी आचार्योंने जन्मग्रहण करके अपने अनन्त ज्ञानकी महिमासे इस जगत्को अनन्त अनादि जानकर अपने अप्रतिहत योगबलसे ब्रह्म और ब्रह्मविषयक सम्पूर्ण तन्त्र निरूपण करादिये है, तबसे लेकर इस पृथ्वीपर कितनेही राजाओका आविर्भाव और तिरोभाव, तथा वसुन्धरापर कितनी बार विप्लव और विपर्यय हुआ है तथा जनसमूहका कितनीवार परिवर्तन हुआ है किन्तु उन महर्षियोके योगबलसे निर्मित वह सकल ग्रन्थ ध्रुवकी समान प्रकाशमान होरहेहैं, उनके इन ज्ञानपूर्ण रत्नोके कारण आजतक यह भारतभूमि जगत्में रत्नभंडार नामसे विख्यात है उन्हीं अमूल्य रत्नोमेसे यह नीतिमय ग्रन्थ “पंचतंत्र” एक अनुपम रत्न है, इसके निर्माण करनेवाले महापंडित विष्णुशर्मा हैं यह अति प्राचीन कालके महापंडित है। इन्होने अति प्राचीन समयके महर्षि मनु, बृहस्पति, शुक्र, वाल्मीकि, पराशर, व्यास, चाणक्य प्रभृति महात्माओके बहुत काल पश्चात् जन्मग्रहण किया है, मधुमक्षिका जिस प्रकार अनेक पुष्पोंसे रस ग्रहणकर अपूर्व मधुकी रचना करती है, विष्णुशर्मानेभी इसी प्रकार अपने पूर्ववर्ती पंडितोके शास्त्रसे सार ग्रहण करके पंचतन्त्रको निर्माण किया है, इसके उपदेश सबही अवस्थामे मनुष्यमात्रको उपयोगी है, क्या योगी, क्या भोगी सबहीको यह समान उपकारक है। इससे योगी योगसिद्धि, भोगी पवित्र भोगशक्ति, रोगी रोगशान्ति, शोकार्त शोकशान्तिको प्राप्त होता है। राजा, प्रजा, गृहस्थ, संन्यासी, पंडित, मूर्ख, धनी, निर्धन, बालक, वृद्ध, युवा, आतुर सबकोही यह स्नेहमयी माताकी समान सुखदायक है।

राजनीति एकवडा शास्त्र है सबको परिश्रमसेभी कठिनतासे आ सकता है इन महात्मा विष्णुशर्माने इसको इस चतुराईसे निर्माण किया है कि, छोटीसे छोटी बुद्धिके मनुष्य भी सरलतासे इसके आशयको समझ सक्ते है, सम्पूर्ण नीति कथाओमे लाकर इस प्रकारसे वर्णनकी है कि, जिससे पढनेवालेकी बुद्धि चमत्कृत होजाती है।

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( ६ ) पञ्चतन्त्र भाषाटीकाकी-

कालक्रमसे इस ग्रन्थका सौरभ जब देश विदेशमे विकीर्ण हुआ तब परदेश के अनेक गुणग्राही इस देशमें आकर इस अपूर्व मधुको ग्रहण करने लगे, क्रमसे यह और इनका दूसरा ग्रन्थ हितोपदेश पृथ्वीके नानादेशोंमें अनेक भाषा और अनेक आकारसे प्रचलित हुए ( १ ) इसकी नीतिगर्भित कथायें असभ्य जातियोंमें भी अनेक नामसे प्रचलित हुई हैं ।

ऐशिया, यूरूप, अमेरिकाआदि सम्पूर्ण देशोंके सम्पूर्ण धर्मावलम्बी लोक सिद्धवाक्यके समान इसके उपदेशोंमें श्रद्धा और भक्ति करते हैं ।

पंचतंत्रके कर्ता किस समय किस स्थानमें प्रादुर्भूत हुए, विष्णुशर्मा उनका प्राकृत नाम है कि नही, यह सम्पूर्ण ऐतिहासिक वृत्तान्त स्पष्टरूपसे जाननेका कोई उपाय नहीं, कारण कि, भारतवर्षके प्राचीन आचार्योने कही अपने ग्रन्थोंमें अपना लौकिक परिचय नहीं दिया है, वह किस समय, किस देश, किस कुल, किस अवस्थामें प्रादुर्भूत हुए थे, क्या आकृति थी इत्यादि आधुनिक ऐतिहासिक परिचय कुछ भी नहीं जाना जाता और उन्हे आत्मपरिचय देनेकी आवश्यकता भी क्या थी । वे सम्पूर्णरूपसे अपनेको भुलाकर तन्मय भावसे ज्ञानचिन्तामें मग्न थे । वह महायोगी सिद्धिलाभ करके ही आत्माको चरितार्थ ज्ञानमय करतेथे । ग्रन्थमें ग्रन्थकारका नाम धाम आदि परिचय देनेमें उनकी इच्छा ही नहीं होतीथी; रामायण, महाभारत, हरिवंशादि ग्रन्थोंमें भी अपरिमित प्रभावशाली उन ऋषियोंने अपना नाम धामका उल्लेख नहीं किया है, वाल्मीकि व्यास यह प्रकृत नाम नहीं हैं किन्तु वल्मीकसे प्राप्त होनेसे वाल्मिकि और वेद विभागकरनेसे वेदव्यास 'व्यास' नाम हुआहै । इन महर्षियोंके निर्माणकिये ज्ञानकाण्डकी ब्रह्मासे स्तम्बपर्यन्त व्याप्त होनेवाली विशालता देखकर तथा उनमें एक एककी आकृतिका ध्यान करके सम्मुख एक एक महानुभावकी विशाल मूर्ति आविर्भूत होती है । यद्यपि उन्होंने अपना लौकिक परिचय नहीं दियाहै परन्तु जो मनुष्योंका यथार्थ परिचय है वह उस अलौकिक ज्ञानका परिचय प्रदान करगये हैं, वे जीवलोकके कल्याण करनेको यह अमूल्य ज्ञानधन संचय करगये हैं, इसकारण उनका आत्मपरिचय तो चन्द्र सूर्यकी स्थितिपर्यंत है महावीर कर्णने कहाहै-


( १ ) हिब्रू, लाटिन, ग्रीक, सायरिअ, इटेलिक, जर्मनी, फ्रेंच, स्पेनिश, अरबी, पारसी, तुरुष्क, चीन, उर्दू, अंग्रेजी, बंगला, प्रभृति पृथ्वीकी प्राचीन व आधुनिक जितनी भाषा है सबमें गद्य और पद्यमें पंचतंत्र और हितोपदेशका अनुवाद है ।

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भूमिका । (७)

सूतो वा सूतपुत्रो वा यो वा को वा भवाम्यहम् ।
दैवायत्तं कुले जन्म मदायत्तन्तु पौरुषम् ॥

अर्थात् चाहै सूत हूं चाहै सूतपुत्र हू जो कोईभी मै हू इससे क्या ? कुलमे जन्म दैवाधीन है परन्तु पुरुषार्थ तो मेरे आधीन है (वेणीसंहार) अर्थात् पुरुषार्थ ही हमारा परिचय है । इसकारण पञ्चतंत्रके कर्ताका नाम धाम वंशका परिचय न पानेसे मनुष्यजातिकी कोई हानि नहीं, उनका यह पञ्चतंत्रही अनन्त काल पर्यत जीव लोकका महाउपकार साधनकर उनके मनुष्यत्वका परिचय प्रदान करता रहेगा ( १ )

पञ्चतंत्र और हितोपदेश यह दो ग्रन्थ विष्णुशर्माके रचित हैं यह प्रसिद्ध है । जिसमे यह पञ्चतन्त्र पहला और हितोपदेश इसका सार लेकर पीछे निर्माण किया गया है, दोनो ग्रन्थोमें एकही वस्तु कथन की है इसमें विस्तार और हितोपदेशमे संक्षेप है । इसमे पांचतंत्र और हितोपदेशमे चार तन्त्र है, कहीं कहीं हितोपदेशमें पचतन्त्रके सिवाय अन्य स्थानोँसे भी सग्रह किया है यथा—

मित्रलाभः सुहृद्भेदो विग्रहस्सन्धिरेव च ।
पञ्चतन्त्रान्तथान्यास्माद्ग्रन्थादाकृष्य लिख्यते ॥ १ ॥

अर्थात् मित्रलाभ, सुहृद्भेद, विग्रह और सन्धि यह पचतन्त्र तथा अन्य ग्रथोसे लाकर लिखते है । मंगलाचरणमे विष्णुशर्माने मनु, वृहस्पति, शुक्र, पराशर, व्यास, चाणक्यादि नीतिशास्त्र करनेवालोको नमस्कार किया है इससे चाणक्यके पश्चात्‌ही विष्णुशर्मा हुए है इसमे तो कोई सन्देह नहीं है, कारण कि, नीतिशास्त्रके कर्ता जगत्पूज्य हुए है और ब्रह्मासे यह शास्त्र प्रादुर्भूत हुआ है, महाभारत राजधर्मके ५९ अध्यायमे लिखा है—देवताओकी प्रार्थनासे ब्रह्माजीने लक्षश्लोकमे नीतिशास्त्र निर्माण किया, शिवजीने संक्षेप कर दशसहस्र अध्याय किये और विशालाक्ष शिवका नाम है इस कारण वह शास्त्र विशालाक्ष नामसे प्रसिद्ध हुआ, इन्द्रने शिवजीसे पढ़ पाच सहस्र अध्यायमे संक्षेप कर अपने नामके अनुसार उसका नाम बाहुदन्तिक रक्खा । फिर वृहस्पतिने तीन सहस्र अध्यायोमे संक्षेप कर उसका नाम बार्हस्पत्य प्रसिद्ध किया । शुक्राचार्यने उसे एक सहस्र अध्यायोमे संक्षिप्त कर उसका नाम औशनस रक्खा । गरुडपुराणमे देखा जाता है कि, चाणक्यने वृहस्पतिप्रणीत नीतिशास्त्रका सग्रह कर उससे


१ पञ्चतन्त्रमे बहुतसी कथा महिलारोप्य नगरका परिचय देकर लिखी है, यद्यपि इसका नाम इस समय क्या है सो विदित नही होता परन्तु सूक्ष्मविचारसे विदित होता है कि, कदाचित् यही दक्षिण देशमे विष्णुशर्माके रहनेका स्थान हो ।

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( ८ ) पञ्चतन्त्र भाषाटीकाकी-

श्लोक संगृहीत किये इसकारण नीतिशास्त्र ग्रन्थके श्लोक और चाणक्यके श्लोक प्रायः एकरूप है । दण्डिप्रणीत दशकुमारचरितके विश्रुतचरित्रमें लिखा है कि, विष्णु गुप्त अर्थात् चाणक्यने मौर्यवंशीय महाराज चन्द्रगुप्तके लिये पूर्वप्रचलित नीतिशास्त्रको संक्षिप्त करके छः सहस्र श्लोकोंमें निबद्ध किया, शास्त्रके पारगामी महापंडित विष्णुशर्माको जगत्का प्राचीन रत्नसंग्रहकर्ता पुरुष कहना उचित है, यह सत्य है कि, इन्होंने यह ग्रन्थ प्राचीन ग्रन्थ बार्हस्पत्य, महाभारत, आदिग्रन्थोंसे संग्रह किया है, परन्तु इन्होंने यह रत्न अपूर्व आख्यायिकारूप सूत्रमें इस प्रकार गूंथे है कि, उनकी असाधारण बहुदर्शिता, अद्भुत सारग्राहिता, तथा विचित्र रचना कौशलकी सबही मुक्तकण्ठसे प्रशंसा करते है, उनका रचित गद्य इतना सरल, मनोहर और शुद्ध है कि उसके देखनेसेही बोध होता है कि, इसप्रकारका अन्य कोई ग्रन्थ सरलता मधुरतासे पूर्ण संस्कृतसाहित्यमें नहीं है,उनकी चमत्कारिणी गद्यरचना संस्कृतकी गद्यरचनाका आदर्श स्वरूप है, इसमें सन्देह नहीं कि, इन्होंने प्राचीन सामग्रीसे अपनी बुद्धिके बलसे एक अपूर्व नूतन पदार्थकी सृष्टि की है ।

पञ्चतन्त्रकी कथाओंका मूलतंत्र निरूपण करना बड़ा कठिन है, जैसी कहानी भारतवासी अपने छोटे बालकोंको सुनाया करते हैं और जो बहुत कालतक क्रमसे कण्ठमेंही चलीआती थीं, वैसीही कथाओंको शिक्षासहित महापंडित विष्णुशर्माने लिखा है। पञ्चतन्त्रकी कहावत हमारे देशकी शिक्षाका प्रथम सोपान है, तथा मनुष्य जातिका बाल्यावस्थाके निमित्त एक सरल मधुर और कोमल पदार्थ है, तथा जगत्का प्रथम सत्व भारतकी अतिपुरातन श्लाघनीय सम्पत्ति है यह अवश्यही सबको स्वीकार है ।

महाभारत हमारे देशकी अतिपुरातन सम्पत्ति है, प्रायः महाभारतकी रचनाको साढेचार सहस्र वर्षसे अधिक व्यतीत होचुकेहैं, इसमें सन्देह नहीं कि, इस ग्रन्थमें मनुष्यजातिके अतिपुरातन चित्र खैंचकर सम्पूर्ण नीति और धर्मके आख्यान बड़ी चमत्कारतासे वर्णन किये हैं, अनेक स्थलोंमें पंचतन्त्रकी रीति के समान धर्मादिविषय निरूपण किये हैं, बहुत क्या पञ्चतन्त्र और हितोपदेशकी कई कथा महाभारतसे लेकर लिखीगई हैं, जैसे व्याध-कपोत आदि इससे विदित होता है कि, कोई २ कथा भारतसे पहले भी विद्यमान थी और अधिक खोज करनेसे यहभी जाना जाता है कि, सबसे अधिक प्राचीन ग्रन्थोंमें भी कहीं कहीं ऐसी कथा लिखी हैं, विष्णुशर्माने कोई पुरानी लिखित कथा और कोई पुरुष परंपरासे प्राप्त प्राचीन कथा संग्रह करके मनोहर लिपिसूत्रमें ग्रथित किया है, इनकी कहावत किस देशमें किस आकार और रूपमें वर्तमान है

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भूमिका । (९)

इसका विस्तार विद्वान् कोलब्रुक साहबने अपने टीका किये पंचतंत्रकी भूमिकामें लिखा है यहाँ अप्रासंगिक जानकर वह वार्ता लिखना उचित नही है ।

इसप्रकार सर्व देशप्रचलित और विख्यात इस ग्रन्थका भाषान्तर होकर समस्त भूमंडलमे प्रकाशित होरहा है, परन्तु आजतकभी हिन्दी भाषाके भण्डारमे इसका नाम अंकित नहीं हुआ था, हां १ हितोपदेशके ऊपर कई भाषाटीका छपचुकी है जिनमें एक हितोपदेशकी भाषाटीका अपने शिष्यद्वारा निजअनुमतिसे कराय भलीप्रकार शुद्धकर कल्याणमें सम्वत् १९५० मे मुद्रित कर चुके है, परन्तु कितनीही आवश्यकीय वार्ताओंसे युक्त भूमिका, परिशिष्ट, आशय, उपदेशके मर्मसहित अत्युत्तम भाषामे पंडित बलदेवप्रसादमिश्रने अनुवाद किया है वह मुद्रित (१) होनेपर देखनेही योग्य होगा और कथा टिप्पणीके सिवाय उसमे यहभी दिखलाया है किं, हितोपदेशमे कौन श्लोक किस ग्रंथका है जिससे अनुवादकके परिश्रमका पूर्ण परिचय लक्षित होता है ।

इस समय संस्कृतका उतना प्रचार नहीं है कि, जैसा पूर्व समयमें था और हमारे आचार विचार नीति रीति धर्मादिके ग्रंथ प्रायः सब संस्कृतमें ही विद्यमान है अब कालक्रमसे प्रायः वृत्तिकी आशासे ब्राह्मणादि वर्ण विदेशीय भाषाओंमें यहां तक रुचि रखते है कि, बहुधा विदेशीय भाषाको सीखकर अपना कर्म धर्म भी विदेशीय रीति नीतिके अनुसार बदल डालना चाहते हैं, अपने शास्त्रका मर्म कुछ जानते नहीं है केवल विदेशीय टीके वा हांमे हां मिलानेवाले वा पक्षपातियोकी गप्पसेही अपनेको धर्म रीति नीतिका तत्त्वज्ञाता मानकर शास्त्रोंपर मीमांसा करने लगे हैं, कोई बालविवाहसेही देशका बिगाड़ समझकर ४८ वर्षका पुरुष २० वर्षकी कन्यासे विवाह करनेसे ही देशका उद्धार बल विद्याकी उन्नति समझते हैं, कोई शास्त्रके मर्मको बिना समझे यहां तक अधीर होगये हैं कि, जब किसी प्रकार बल नही चला तो अपना नामभी रिफार्मरोंमे होजाय इस कारण विदेशीय रीतिपर आरूढ हो ईश्वरके आगे चिल्ली पुकार कर मनकी उमंग निकालते हैं, अभी मुरादाबादसे भी विवाहविचारमें एक पुस्तक ऐसीही विचित्र लीलाकी प्रकाशित होचुकी है। कोई आगमें घी फूंकनेसे ही देश भरकी वायु शुद्ध करनेका साहस करके कुण्डोंमें प्रतिदिन आधी छटांक वा छटांकभर घी फूंककर देशको सुगंधित कररहे हैं, कोई विधवाविवाह नियोग करना धर्म शास्त्रके अनुसार कहकर अपनेको विधवाऋणसे उऋण मान देशका मुख उज्ज्वल कररहे है, कोई एक एक स्त्रीके ग्यारह पतिकी आज्ञा देकर वेदार्थके


१ इस (स० १९६६) समय इसकी द्वितीयावृत्तिभी छपके बिकरही है ।

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( १० ) पञ्चतन्त्र भाषाटीकाकी-

लोट फेर करनेसेही देशका भला और अपनेको कृतकृत्य मानते हैं, कोई चारों-वर्णोंका खान पान एक करके भारतभूमिके सुपुत्र कहलानेकी उत्कट इच्छा करते हैं, कोई फारसी अंग्रेजी पढकर ही समस्त वेदवेदांगका तत्व निरूपणकर देशका भला करनेके साहसी होरहे हैं, इत्यादि जहां देखो जहां सुनो देशसुधार जातिसुधार देशोन्नतिकी पुकार जल वायुकी शुद्धिका विचारही श्रवणगोचर होता है अब इसके फलकी ओर दृष्टि की जाती है तो सर्वथा परिणाम उलटा दृष्टि आता है, मनमें और वचनमें और कार्यमें और है, विदेशियोंकी रीतिपर लेखनी चलीजाती है, खण्डन मण्डनमें पत्र रंग दिये जाते हैं, फल क्या है, कालपडते जाते है, महामारीसे देश उजड़े जाते हैं, लोग अल्पायु निर्धन हुए जाते है, जल, वायु बिगड़े जाते है इसी वर्षको विचार लीजिये कि ( १९५३, १९५४ ) वर्षके इस अकालने देशभरमें डामाडोल मचादिया है, असंख्य भारतवासी भूखे मर गये, देशभर ‘दीयताम्’ की पुकारसे गूंजउठा है, कितनेही शहर भूखोंने लूटे, कितनीही आत्महत्यां हुई, कितनेही बिके, कितनेही अयोग्य कृत्यमें प्रवृत्त हुए, कितनेही पशुओकी भांति घासपत्तेतक खागये, चौगुने पचगुने मोल अन्न होगया, लक्ष्यों रुपया सरकारने भी व्यय किया, सनातनधर्मावलम्बी महात्माओंने सदावर्त जारी किये, दूसरे यूरपदेशोंसे भी लक्ष्यों चन्दा आया, परन्तु महाभूखसे आरत भारतके लिये वह क्या कुछ होसकता है, हमको भूखोंकी जो दशा दृष्टिगोचर हुई कि, जो भूखके मारे प्राण छोड़नाही चाहते हैं, जो जंगलमें वृक्षोंके नीचे मरणोन्मुख पड़े हैं, उनके पास कितने जल और अन्न लेकर पहुंचे है, और हो भी क्या जिसके पास स्वयं नहीं वह दूसरेको क्या देगा, श्रावण भादों दोनों महीने साफ उतरगये अग्निमें घृत चढ़ानेपर भी इन्द्रदेवने जल न दिया, इधर तो यह अन्नकष्ट उधर रोगकष्ट भी देखिये भारतवासी बहुत दिनोंसे विषूचिकासे परिचित हैं, प्रतिवर्ष प्रायः सर्व नगरोंमे हैजेका प्रादुर्भाव होता है, चौबीस घण्टेकी लड़ाईमें बहुधा मनुष्य इससे हारकर कालकवलित होते हैं, परन्तु बहुत दिनोंके परिचित होनेसे इसके नामसेही कम्पित नहीं होते थे, परन्तु इस समय जिस आकारमें (प्लेग) महामारी (ग्रन्थि विसर्प) बम्बईसे प्रगट हुई है उसे सुनकर ही बडे २ धीरजवाले थर्रागये हैं, सहस्रों मनुष्य अचानक इसके उपस्थित होनेमें कालकवलित हुए है, ज्वर और ग्रन्थि निकलते ही मनुष्यका प्राण पयान कर जाता है, घरके घर खाली होगये हैं, लक्ष्यों मनुष्य देशान्तरोंको भाग गये हैं, बीमारी भी बम्बईसे आगे चलकर पूना आदि देशोंमें फैल गई है अब भागकर भी कहाँ जाँय, एक ओर ‘दीयताम्’ और एक ओर ‘त्रायस्व’ (रक्षाकरो) की ध्वनि फैल रही है । महा-

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भूमिका । ( ११ )

मारीके रोकनेके निमित्त बड़े २ उच्च श्रेणीके नवीन रीति नीतिवालोके महा-घोर प्रयत्न भी निष्फल हो रहे है । महामारीसम्बन्धी नियमावली बनचुकी है रोगी होते ही घरवालोसे पृथक् कर शहरसे दूर चिकित्सालयमे रक्खा जाय, रोगीके मरनेपर झोपडा फूकनेकी आज्ञा है, मकानमें मरे तो दोदो इंच मट्टी खुदवा कर फेंक दो, उसकी खाट कपडे जला दो, मकानका द्वार झुलस दो, प्रेतहारी दशदिनतक नगरमें न आवे, इत्यादि प्रबन्धोकी धूमसे भारतवासी तीसरा संकट भोग रहे है, अब कहाँ भागे, रेलपर कठिन जांच होती है, अनेक प्रकारसे स्त्री पुरुषोकी मनमानी परीक्षा करते है, पुलिसकी बनपडी है, कई हत्या भी इस विषयमे हो चुकी है, सन्देह होतेही लोग शिफाखाने भेजे जाते है, वहाँ उनका रामही रक्षक है, आगे महामारी न फैले इस कारण शहरोमे सफाई कराई जाती है सब कच्चे पक्के मकान चूनेसे पुताये जाते है, किसीने सत्य कहा है बारह वर्षमे घरके दिन भी फिरते है, हमने स्वय देखा है कि, जिन निकृष्ट जनोके कच्चे मकानोमे वा बाजारकी दूकानोके भीतर मट्टीका भी पोता नही लगाथा, वहाँ सरकारी आज्ञासे मट्टीकी चांदनी हो रही है, अन्न कष्ट रोग कष्ट, द्रव्य कष्ट, राज्य दंड, आदि कई कष्ट, एकसाथ उपस्थित हो रहे है बडे २ देशउद्धारक मौन हैं, हम पूछते है यह क्या हुआ, यह कैसी उन्नति हो रही है, यह वायुमे मलिनता कहाँकी आगई, पहले ऐसा सफाईका प्रबन्ध नहीं था, नई ऐसी रीति नीति नहीं थी, जिस कारणसे आप देशका सुधार कहते है वह बात नहीं थी. परन्तु तथापि राजा प्रजा आनन्दसे रहतेथे, अन्न धनका रोगका ऐसा कष्ट किसीसमय नहीं पडाथा, पुराने इतिहास ही इसके साक्षी है, तब क्या था, तब यही वार्ता थी कि, भारतवर्षकी चिकित्सा भारतवर्षके नियामक धर्मग्रंथोके अनुसारही होतीथी, जप, तप, संयम, पूजा, पाठ, सत्य, स्तुति, प्रार्थना, हवन, अन्तर्वाह्य शुद्धि, सरलता, निष्कपटता, आस्तिकता शास्त्रोकी सत् व्याख्या, निष्पक्षता आदि मनुष्यमात्र अवलम्बन कियेथे, इससे देशभर मंगलयुक्त रहता था, जबसे संस्कृत विद्याकी न्यूनता और कृत्यमे अलसता प्राप्तहुई तभीसे देशमें नये २ रोगादि कष्ट उपस्थित होनेलगे है, लोग अपनी रीति नीति भूले जाते हैं, इस कारण बहुतसे दूरदर्शी विद्वानोंने यह भार अपने ऊपर लियाहै कि, पुरातन ग्रंथोंका जहाँतक हो यथार्थ अनुवाद करके पक्षपातरहित अर्थ कियाजाय जिससे प्राचीन समयके व्यवहार दर्पणवत् महाशयोके सम्मुख उपस्थित होजॉय, मानना या न मानना यह पाठकोके आधीन है, यही विचारकर हमने भी वाल्मीकिरामायण, शिवपुराण, श्रीमद्भागवत, हरिवंशादि कितनेही ग्रन्थोंका देशभाषामे यथार्थ अनुवाद कियाहै और

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( १२ ) पञ्चतन्त्र भाषाटीकाकी-

कितनेही ग्रंथोंका अनुवाद कियाजाताहै कि, जिससे विज्ञ महाशय अपने धर्म कर्मको यथार्थ जान उसमें प्रवृत्त होकर उभय लोकमें सुख प्राप्तकरें, जिसप्रकार धर्मादि करना मनुष्य मात्रका कार्य है, इसीप्रकार लोकनिर्वाह और बुद्धिकी अधिकाईके निमित्त नीतिका जाननाभी मनुष्य मात्रको उचित है, इसीकारण सब प्रकारके गुणोंसे युक्त विद्यार्थियोंको परम उपकारक इस “पंचतंत्र” ग्रंथका भाषामे अनुवाद कियाहै, ऐसा कौन है कि इसकी कथामें जिसे रुचि न हो, यह ग्रंथ सर्करी परीक्षाओंमें भी नियुक्त है और अंग्रेजीके साथ जो संस्कृत पढाई जाती है उसके साथभी इसका कोई न कोई अंश अवश्य रहता है, इसकारण संस्कृतके विद्यार्थियोंकोभी उपयोगी हो, इस निमित्त संस्कृतके शब्दोंके अनुसारही इसका भावार्थ किया है, कहीं कुछ न्यूनाधिक नहीं कियाहै और जहाँ कहीं अर्थ खोलनेके लिये कुछ विशेष लिखा है वहां कोष्ठ करादिया है और संस्कृतमें जहां वाक्य समाप्त होकर ऐसी । रेखा कर वहां भाषामें भी ऐसीही रेखा कर दीहै, जिससे विद्यार्थियोंको शब्दार्थ जाननेमें कठिनता न पडे, हाँ अन्वयानुसार अर्थ करनेके कारण श्लोकमें अधिकतर कर्तासे अर्थका करना प्रारम्भ किया है यदि ऐसा न करते तो श्लोकार्थ रुचिकर सरस न होता श्लोकका अन्वय कर पाठक उसीके अनुसार अर्थ पासकेंगे ।

इस ग्रन्थमें नीतिकी उत्कृष्टता सबका सार लेकर वर्णन की है इसकारण इस टीकेका नामभी “नीतिसर्वस्व” रक्खा है ।

इसप्रकार यह ग्रन्थ पूर्णकर जगद्विख्यात परमप्रवीण सनातनधर्म निरत सद्ग्रन्थप्रचारक परमउपकारक गुणिजनरंजक परमोदार “श्रीवेंकटेश्वर” यंत्रालयाध्यक्ष सेठजी श्रीयुत खेमराज श्रीकृष्णदासजी महाशयको सम्पूर्ण स्वत्वके सहित समर्पण करदियाहै जो कि, अपनी परम उदारतासे हमको सब प्रकार सन्तुष्ट कररहेहै ।

हिन्दी भाषाके परम रसिक हमारे परम अनुग्राहक द्विजवंशदिवाकर दानशील पंडित हरसहाय पाठक तथा कुमार बनारसी दासजी एम. ए. बाबू उदित नारायण लाल वर्मा प्लीडर गाजीपुर तथा पंडित हरिहर प्रसाद पाठक मेनेजर “सत्यसिंधु”, लाला शालिग्रामजी वैश्य, सेठ कुन्दन लाल आदि विज्ञ जनभी धन्य वादके योग्य हैं जो हिन्दी भाषाके प्रचारमें सदा रत रहते हैं ।

पाठक महाशयोंसे प्रार्थना है कि, यथाशक्ति टीका करनेमें कोई त्रुटि नहीं की है तथापि यदि कहीं भूल चूक पावै तो उसे क्षमा करें कारण कि, सर्वज्ञ परमेश्वरहीहैं ।

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भूमिका । ( १३ )

विदेशीय महाशयोंने जो हमारे ग्रन्थोंको देख प्रशंसापत्र भेजे हैं उनको हम अन्तःकरणसे धन्यवाद देते हैं ।

और अबकी बार फिर भी भलीभांति संशोधन कर उत्तम व्यवस्थासे छपकर तैयार हुआ है, आशा है कि, नीतिप्रिय महाशय इसे ग्रहणकर स्वयं अमूल्य लाभ उठावेंगे और ग्रन्थकार टीकाकार एवं प्रकाशकको सफल मनोरथ करेंगे ।

पण्डित ज्वालाप्रसाद मिश्र,
दीनदार पुरा-मुरादाबाद.

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अथ पञ्चतन्त्रकी कथासूची ।


विषय.पृष्ठ.
कथामुख .... ... ... ... ... ....१

मित्रभेद प्रथम तन्त्र । ६

विषय.पृष्ठ.
१ वानरोके यूथकी कथा... ... ... ... ....१३
२ शृगाल और भेरीकी कथा ... ... ... ...३५
३ दन्तिलकी कथा ... ... ... ...४६
४ देवशर्मा परिव्राजकादिकी कथा ... ... ... ...५९
५ विष्णुरूपकौलिककी कथा ... ... ... ...८०
६ काकी और कनक सूत्रकी कथा... ... ... ...९३
७ बक और कर्कटकी कथा ... ... ... ...९४
८ भासुरक सिंहकी कथा ... ... ... ...१०१
९ मत्कुण मन्दविसर्पिणीकी कथा ... ... ... ...११५
१० चण्डरव शृगालकी कथा ... ... ... ...११९
११ मदोत्कट सिंहकी कथा ... ... ... ...१३०
१२ टिट्टिभ और समुद्रकी कथा ... ... ... ...१४२
१३ दुर्बुद्धिकूर्मकी कथा ... ... ... ... ...१४४
१४ अनागत विधाता आदि तीन मच्छोकी कथा.... ... ...१४७
१५ चटकी काष्ठकूटकी कथा ... ... ... ...१५२
१६ वज्रदंष्ट्र सिंहकी कथा... ... ... ... ...१६७
१७ सूचीमुख वानरकी कथा ... ... ... ...१७८
१८ चटक दम्पतीकी कथा ... ... ... ....१८०
१९ धर्मबुद्धि ग्राम्यबुद्धिकी कथा ... ... ... ...१८३
२० मूर्ख बक और नोलेकी कथा ... ... ... ....१८९
२१ जीर्णधन वणिक् पुत्रकी कथा ... ... ... ...१९१
२२ मूर्ख वानर और राजाकी कथा ... ... ... ...१९५

मित्रसम्प्राप्ति द्वितीय तंत्र । २०२

विषय.पृष्ठ.
चित्रग्रीव उपाख्यान ... ... ... ... ....२०३
हिरण्यक लघुपतनक संवाद ... ... ... ....२१३
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पञ्चतन्त्रकी कथासूची । ( १५ )

विषयपृष्ठ-
१ हिरण्यक वृत्तान्तकी कथा . .२२७
२ तिल बेचने वालीकी कथा . ..२३२
३ पुलिन्दकी कथा .. ... . ...२३४
४ सागरदत्त वणिककी कथा . ....२४७
५ सोमलिककी कथा ... .२५८
६ वृषभके पीछे फिरनेवाले शृगालकी कथा .२५४

काकोलूकीय तृतीय तन्त्र । २८८

काक उलूक वृत्तान्त .. . | २८८
१ चतुर्दन्त हाथोकी कथा ... .. .. | ३१०
२ शशकपिजलकी कथा ... .. ... | ३१६
३ ब्राह्मण और बकरेकी कथा ... ... | ३२६
४ सर्प और चैंटियोकी कथा ... . | ३२९
५ हरिदत्त ब्राह्मणकी कथा . ... | ३३६
६ पद्मवनके हंसोकी कथा . .. .... | ३३८
७ व्याधकी कथा .. . | ३४१
८ वृद्ध वणिक्की कथा ... .. .. | ३४९
९ चोर और राक्षसकी कथा . .. .... | ३५२
१० वल्मीक और उदरके सर्पकी कथा . | ३५५
११ रथकार और उसकी स्त्रीकी कथा .. ... . .. | ३५८
१२ मूषिकाकी कथा .. . .. | ३६४
१३ स्वर्णष्ठीवीकी कथा . - | ३७१
१४ खर नखर सिंहकी कथा . .. | ३७४
१५ मन्दविष सर्पकी कथा .. | ३८३
१६ घृतान्ध ब्राह्मणकी कथा . .. | ३८६

लब्धप्रणाश चतुर्थ तंत्र । ३८७

१ जलस्थित वानरकी कथा . ... | ३९७
२ गंगदत्त मण्डूककी कथा ... | ४०६
३ करालकेशर सिंहकी कथा . . . | ४१५
४ कुम्भकारकी कथा ... ... . | ४२२
५ सिंह और गीदड़की कथा .. | ४२४

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( १६ ) पञ्चतन्त्रकी कथासूची ।

विषय. पृष्ठ.
६ ब्राह्मणीकी कथा .... ... ... ... .... ४२८
७ नन्दराजाकी कथा .... ... ... ... ... ४३२
८ शुद्ध पट रजककी कथा .... ... ... ... ... ४३४
९ हालिककी स्त्रीकी कथा .... ... ... ... ४३८
१० घंटाबन्ध ऊंटकी कथा ... ... ... ... ४४३
११ चतुरक शृगालकी कथा ... ... ... .... ४४७
१२ चित्रांग सारमेयकी कथा ... .... .... .... ४५२

अपरीक्षित कारक पंचम तंत्र । ४५५

१ मणिभद्रनाम सेठकी कथा ... ... ... ... ४५५
२ ब्राह्मणी और नौलेकी कथा ... ... .... .... ४६३
३ मस्तकपर चक्र भ्रमण करनेवालेकी कथा ... ... ... ४६५
४ सिंह बनाने वाले ब्राह्मणोंकी कथा ... ... ... ४७३
५ मूर्ख पण्डितोंकी कथा .... ... ... .... ४७५
६ शतबुद्धि आदि मत्स्योकी कथा .... ... ... ... ४८०
७ गर्दभ और शृगालकी कथा .... ... ... ... ४८३
८ मन्थर कौलिककी कथा ... .... .... ... ४८७
९ सोमशर्माके पिताकी कथा ... ... .. .... ४९२
१० चन्द्रराजाकी कथा ... ... ... .... .... ४९४
११ राक्षस और राजकन्याकी कथा ... .... ... ... ५०४
१२ अन्धे कुबडे और तीनस्तनवाली राजकन्याकी कथा ... ... ५०८
१३ चण्डकर्मा राक्षस और ब्राह्मणकी कथा .... ... ... ५०९
१४ भारण्डपक्षीकी कथा ... ... ... ... ५१५
१५ कैंकडे और ब्राह्मणकी कथा ... ... . ... ५१७

इति कथासूची समाप्ता ।

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॥ श्रीः ॥

अथ पंचतन्त्रम् ।

भाषाटीकासहितम् ।


ब्रह्मा रुद्रः कुमारो हरिवरुणयमा वह्निरिन्द्रः कुबेर-
श्चन्द्रादित्यौ सरस्वत्युदधियुगनगा वायुरुर्वी भुजङ्गाः ।
सिद्धानद्योऽश्विनौ श्रीर्दितिरदितिसुता मातरश्चाण्डिकाद्या
वेदास्तीर्थानि यज्ञा गणवसुमुनयः पान्तु नित्यं ग्रहाश्च ॥१॥

मया ज्वालाप्रसादेन नमस्कृत्य गजाननम् ।
क्रियते पञ्चतंत्रस्य भाषाटीका मनोरमा ॥

दोहा-शभु शिवा रघुपति सिया, बन्दौं पवनकुमार ।
कृपा करहु जन जान मोहिं, गुणागार सुखसार ॥

ब्रह्मा, शिव, कार्तिकेय, विष्णु, वरुण, यम, अग्नि, इन्द्र, कुबेर, चन्द्र, सूर्य्य, सरस्वती, सागर, चारोंयुग, पर्वत, वायु, पृथ्वी, वासुकि आदि सर्प, कपिलादि सिद्ध, नदी, अश्विनीकुमार, लक्ष्मी, दिति ( कश्यपपत्नी ), अदितिके पुत्र ( देवता ), चण्डिकाआदि मातायें, वेद ( ऋक्, यजु, साम, अथर्व ), तीर्थ ( पुण्यक्षेत्र काशी आदि ), यज्ञ ( दर्श पौर्णमासादि ), गण ( प्रमथादि ), वसु ( आठ देव ), मुनि ( व्यासादि ), ग्रह ( सूर्यादि ), नित्य ( हमारी ) रक्षा करें । स्रग्धरा छन्द है ॥ १ ॥

मनवे वाचस्पतये शुक्राय पराशराय ससुताय ।
चाणक्याय च विदुषे नमोऽस्तु नयशास्त्रकर्तृभ्यः ॥२॥

स्वायम्भू मनु, वृहस्पति, शुक्र, सपुत्र ( व्याससहित ) पराशर, पण्डित चाणक्य और नीतिशास्त्रके बनानेवालोके निमित्त नमस्कार है ॥ २ ॥

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(२) पञ्चतन्त्रम् ।

सकलार्थशास्त्रसारं जगति समालोक्य विष्णुशर्मेदम् ।
तन्त्रैः पञ्चभिरेतच्चकार सुमनोहरं शास्त्रम् ॥ ३ ॥

इस प्रकार विष्णुशर्माने इस जगत्में सम्पूर्ण अर्थशास्त्रका सार देखकर पंच-तंत्रोंमे यह मनोहर शास्त्र निर्माण किया है ॥ ३ ॥

तद्यथा अनुश्रूयते-अस्ति दाक्षिणात्ये जनपदे महिलारोप्यं नाम नगरम् । तत्र सकलार्थिकल्पद्रुमः प्रवरमुकुटमणिमरीचिमञ्जरीचर्चितचरणयुगलः सकलकलापारंगतोऽमरशक्तिर्नाम राजा बभूव । तस्य त्रयः पुत्राः परमदुर्मेधसो बहुशक्तिरुग्रशक्तिरनन्तशक्तिश्चेतिनामानो बभूवुः । अथ राजा तान् शास्त्रविमुखान् आलोक्य सचिवान् आहूय प्रोवाच- “भो ! ज्ञातमेतद्भवद्भिः यन्ममैते पुत्राः शास्त्रविमुखा विवेकरहिताश्च । तत् एतान् पश्यतो मे महदपि राज्यं न सौख्य मावहति । अथवा साध्विदमुच्यते-

सो ऐसा सुना है कि, दक्षिणके देशमें एक महिलारोप्यनाम नगरहै । वहां सम्पूर्ण याचकोंके ( मनोरथ पूर्ण करनेको ) कल्पवृक्ष, बडे बडे निर्जित राजाओंकी मुकुटमणियोँकी किरणोंके समूहसे पूजित चरणयुगल, सम्पूर्ण कलाओंका पारगामी, अमरशक्ति नाम राजा था, उसके तीन पुत्र अतिदुर्बुद्धि--बहुशक्ति, उग्रशक्ति, अनन्तशक्ति नामवाले थे । तब राजा उनको शास्त्रसे विमुख देखकर मन्त्रियोंको बुलाकर बोला--“क्या यह आपको विदित है कि, जो यह मेरे पुत्र शास्त्रसे विमुख विवेक रहित हैं । सो इनको देखकर मुझको यह बडा राज्य सुख नहीं देता है । अथवा किसीने यह अच्छा कहा है कि-

अजातमृतमूर्खेभ्यो मृताजातौ सुतौ वरम् ।
यतस्तौ स्वल्पदुःखाय यावज्जीवं जडो दहेत् ॥ ४ ॥

न हुए, होकर मरगये और मूर्ख इन (तीन प्रकारके ) पुत्रोंमे नहुए और होकर मरगये भले हैं, कारण कि, वे दोनों थोडे दुःखके निमित्त है, मूर्ख तो जन्मपर्यन्त जलाता है ॥ ४ ॥

वरं गर्भस्रावो वरमृतुषु नैवाभिगमनं
वरं जातप्रेतो वरमपि च कन्यैव जनिता ।

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भाषाटीकासमेतम् । ( ३ )

वरं वन्ध्या भार्या वरमपि च गर्भेसु वसति-
र्न चाविद्वान्रूपद्रविणगुणयुक्तोपि तनयः ॥ ५ ॥

गर्भका स्राव होजाना अच्छा है, ऋतुमें स्त्रीके निकट न जाना अच्छा है, उत्पन्न होतेही मरजाना अच्छा है, वा कन्याही होनी अच्छी है, भार्याका वन्ध्या-होनाभी भला, वा गर्भमें रहनाही भला है, परन्तु अपण्डित रूप-द्रव्यसम्पन्नभी पुत्र अच्छा नहीं है ॥ ५ ॥

किं तया क्रियते धेन्वा या न सूते न दुग्धदा ।
कोऽर्थः पुत्रेण जातेन यो न विद्वान्न भक्तिमान् ॥ ६ ॥

उस गौसे क्या किया जाय, जो न जनती है, न दूध देती है, उस पुत्रसे क्या है, जो न विद्वान् है न भक्तिमान् है ॥ ६ ॥

वरमिह वा सुतमरणं मा मूर्खत्वं कुलप्रसूतस्य ।
येन विबुधजनमध्ये जारज इव लज्जते मनुजः ॥ ७ ॥

इस जगत्में पुत्रका मरण अच्छा है, परन्तु कुलोत्पन्न पुत्रका मूर्ख होना भला नहीं, जिससे विद्वानोंके बीचमें मनुष्य जारोत्पन्नकी समान लज्जित होताहै ॥ ७ ॥

गुणिगणगणनारम्भे न पतति काठिनी ससम्भ्रमा यस्य ।
तेनाम्बा यदि सुतिनी वद वन्ध्या कीदृशी भवति ॥ ८ ॥

गुणिजनोंकी गणनाके आरम्भमें जिसकी रेखा भूलसेभी नहीं गिरती है, यदि उसीसे उसकी माता पुत्रवती है, तो कहो वन्ध्या कैसी होती है ? ॥ ८ ॥

तदेतेषां यथा बुद्धिप्रकाशो भवति तथा कोऽप्युपायोऽनुष्ठीयताम् । अत्र च मदत्तां वृत्तिं भुञ्जानानां पण्डितानां पञ्चशती तिष्ठति । ततो यथा मम मनोरथाः सिद्धिं यान्ति तथा अनुष्ठीयताम्” इति । तत्रैकः प्रोवाच-“देव ! द्वादशभिर्वर्षैर्व्याकरणं श्रूयते, ततो धर्मशास्त्राणि मन्वादीनि, अर्थशास्त्राणि चाणक्यादीनि, कामशास्त्राणि वात्स्यायनादीनि । एवं च ततो धर्मार्थकामशास्त्राणि ज्ञायन्ते । ततः प्रतिबोधनं भवति” । अथ तन्मध्यतः सुमतिर्नाम सचिवः प्राह-“अशाश्वतोऽयं जीवितव्यविषयः । प्रभूतकालज्ञेयानि शब्द-

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( ४ ) पञ्चतन्त्रम् ।

शास्त्राणि । तत्संक्षेपमात्रं शास्त्रं किञ्चिदेतेषां प्रबोधनार्थं चिन्त्यतामिति । उक्तञ्च यतः-

सो जैसे इनकी बुद्धिमें प्रकाश हो वैसा कोई उपाय कियाजावै। यहां मेरी दीहुई आजीविकाको भोगते हुए पांचसौ पंडित हैं। सो जैसे मेरे मनोरथ सिद्ध हो, वैसा अनुष्ठान करो"। उनमें एक बोला-"देव ! बारह वर्षमें व्याकरण पढ़ा-जाता है, फिर धर्मशास्त्र मनुआदिके, अर्थशास्त्र चाणक्यादि, कामशास्त्र वात्स्या-यनादि, इसके उपरान्त फिर धर्म, अर्थ, कामशास्त्र जाने जाते हैं, तब ज्ञान होताहै"। तब उनमेंसे सुमति नाम मन्त्री बोला-"यह जीवन विषय अनित्य है, बहुत शब्दशास्त्र बहुत दिनोंमें पढ़ेजाते हैं, सो कोई संक्षेपमात्र शास्त्र इनके ज्ञानके निमित्त विचार करो, कहा भी है-

अनन्तपारं किल शब्दशास्त्रं स्वल्पं तथायुर्बहवश्च विघ्नाः ।
सारं ततो ग्राह्यमपास्य फल्गु हंसैर्यथा क्षीरमिवान्बुमध्यात्।

शब्दशास्त्रका पार नहीं है, अवस्था थोड़ी और विघ्न बहुत हैं, इस कारण सारको ग्रहण करै, असारको त्याग दे, जैसे हंस जलमेंसे दूध निकाल लेते हैं. उपजाति वृत्त है ॥ ९ ॥

तदत्रास्ति विष्णुशर्मा नाम ब्राह्मणः सकलशास्त्रपारङ्गम-श्छात्रसंसदि लब्धकीर्त्तिः तस्मै समर्पयतु एतान् । स नूनं द्राक् प्रबुद्धान् करिष्यति" इति । स राजा तदाकर्ण्य विष्णुशर्माणमाहूय प्रोवाच-"भो भगवन् ! मदनुग्रहार्थमेतान् अर्थशास्त्रं प्रति द्राग्यथा अनन्यसदृशान् विद्धासि तथा कुरु। तदा अहं त्वां शासनशतेन योजयिष्यामि"। अथविष्णुशर्मा तं राजानमूचे-"देव ! श्रूयतां मे तथ्यवचनमानाहं विद्याविक्रयं शासनशतेनापि करोमि। पुनरेतांस्तव पुत्रान् मासषट्केन यदि नीतिशास्त्रज्ञान् न करोमि ततः स्वनामत्योगं करोमि । किं बहुना, श्रूयतां ममैष सिंहनादः नाहमर्थलिप्सुर्ब्रवीमि । ममाशीतिवर्षस्य व्यावृतसर्व्वेन्द्रियार्थस्य न किञ्चिदर्थेन प्रयोजनं किन्तु त्वत्प्रार्थनासिद्धयर्थं सरस्वतीविनोदं करि-

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भाषाटीकासमेतम् ! (५)

ष्यामि। तल्लिख्यतामद्यतनो दिवसः। यदि अहं षण्मासाभ्यन्तरे तव पुत्रान् नयशास्त्रं प्रति अनन्यसदृशान् न करिष्यामि ततो नार्हति देवो देवमार्गं सन्दर्शयितुम्”। अथासौ राजा तां ब्राह्मणस्यासंभव्यां प्रतिज्ञां श्रुत्वा ससचिवः प्रहृष्टो विस्मयान्वितः तस्मै सादरं तान् कुमारान् समर्प्य परां निर्वृत्तिमाजगाम। विष्णुशर्म्मणापि तानादाय तदर्थं मित्रभेद-मित्रप्राप्ति-काकोलूकीय-लब्धप्रणाश-अपरीक्षितकारकाणि चेति पञ्च तन्त्राणिरचयित्वा पाठितास्ते राजपुत्राः। तेऽपि तानि अधीत्य मासषट्केन यथोक्ताः संवृत्ताः। ततः प्रभृति एतत्पञ्चतन्त्रकं नाम नीतिशास्त्रं बालावबोधनार्थं भूतले प्रवृत्तम्। किं बहुना।

सो यहा एक विष्णुशर्मा नाम ब्राह्मण सब शास्त्रका पारगामी विद्यार्थियोंमें प्राप्त यशवाला है, उसके निमित्त इन पुत्रोंको समर्पण करदो वह अवश्य शीघ्र इनको ज्ञानवान् करदेगा”। वह राजा यह वचन सुन विष्णुशर्माको बुलाकर बोला-“भगवन् ! मुझपर कृपाकर इन मेरे पुत्रोंको अर्थशास्त्रमें शीघ्रही असाधारण जैसे बनें तैसे करो। तो मै तुमको सौ सङ्ख्याक सम्भत् दूंगा”। तब विष्णुशर्मा उस राजासे कहने लगा-“देव ! मेरा सत्य वचन सुनो, मैं सम्पत्से विद्याविक्रय नहीं करताहू, परन्तु इन तुम्हारे पुत्रोंको यदि छः महीनेमे नीतिशास्त्रका ज्ञाता न करू तो अपना नाम त्यागकरू। बहुत कहनेसे क्या है मेरा यह सिंहवद्गर्जन सुनो धनकी इच्छामे मैं नहीं कहताहूं। मुझ अस्सी वर्षके सब इन्द्रियोंके भोग्यसे निस्पृह हुएको अर्थसे कुछ प्रयोजन नहीं है, परन्तु तुम्हारी प्रार्थना सिद्धिके निमित्त सरस्वती विनोद करूगा। सो आजका दिन लिखिये जो मैं छः महीनेमें तुम्हारे पुत्रोंको विद्यामें असाधारण (जिसके बराबर कोई नहो) न करू तो जगदीश्वर मुझको देवमार्ग (स्वर्ग) न दिखावे”। तब यह राजा इस ब्राह्मणकी असम्भाव्य (असम्भावसी) प्रतिज्ञाको सुनकर, मन्त्रियों सहित प्रसन्न हो, विस्मयको प्राप्त हुआ। उसके निमित्त आदरसे उन कुमारोंको समर्पणकर, अत्यन्त सन्तोषको प्राप्त हुआ। विष्णुशर्मानेभी उनको ले उनके निमित्त मित्रभेद, मित्रसम्प्राप्ति, काकोलूकीय, लब्धप्रणाश, अपरीक्षितकारक इन पाच