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पंचतन्त्रम् (सटीक - सम्पूर्ण पाँचों तन्त्र)

पंचतन्त्रम् (सटीक - सम्पूर्ण पाँचों तन्त्र)

Panchatantra (with Commentary – All Five Tantras)

by पण्डित विष्णु शर्मा

Source: पंचतन्त्रम् (सटीक - सम्पूर्ण पाँचों तन्त्र) · श्रीवेङ्कटेश्वर स्टीम प्रेस, बम्बई · 1910 (origin)

DevanagariHindipublished536 pages

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( ३५४ ) पञ्चतन्त्रम् ।
कर जाना"। वह बोला—"जो यह ब्राह्मण गोके शब्दसे जाग जाय तो यह
मेरा आरम्भ अनर्थक होजायगा"। चोर बोला,—"यदि तुम्हारे भक्षणमें कोई विघ्न
उपस्थित होजावे तो मैं भी दोनो बछडोंके हरणको समर्थ न हूूंगा। तब पहले
मेरे गोयुगके हरण करनेके पीछे तुम ब्राह्मणको भक्षण करना"। इस प्रकार मैं
पहले मैं पहले ऐसे परस्पर विवाद करते उन दोनोंके केलश उत्पन्न होनेमें शब्द
होनेके कारण ब्राह्मण जाग उठा। तब उससे चोर बोला—"ब्राह्मण ! यह
राक्षस तुझे खानेकी इच्छा करता है" राक्षस बोला,—"ब्राह्मण ! यह चोर तेरे
दोनो बछडे चुराना चाहता है" यह सुनकर ब्राह्मण उठ सावधान हो इष्ट देव-
ताके मन्त्र उच्चारणसे अपनेको राक्षससे और लकडी उठाकर चोरसे दोनो
बछडोंकी रक्षा करता भया। इसमें मैं कहता हूं—
"शत्रवोऽपि हितायैव विवदन्तः परस्परम् ।
चौरेण जीवितं दत्तं राक्षसेन तु गोयुगम् ॥ १९८ ॥"
"परस्पर विवाद करते शत्रुभी हितके निमित्त होते हैं चोरने जीवित और राक्ष-
सने इस प्रकार दो बछडे दिये ॥ १९८ ॥"
अथ तस्य वचनमवधार्य अरिमर्दनः पुनरपि प्राकार-
कर्णमपृच्छत्,—"कथय किमत्र मन्यते भवान् ?" सोऽब्रवीत्,
"देव ! अवध्य एवायं, यतो रक्षितेन अनेन कदाचित् पर-
स्परप्रीत्या कालः सुखेन गच्छति। उक्तञ्च—
तब उसके वचनको सुन अरिमर्दन फिर प्राकारकर्णसे पूछने लगा—"कहो
तुम इसमें क्या मानते हो ?" वह बोला,—"देव ! यह अवध्य है। जो इसकी
रक्षा करनेसे कदाचित् प्रीतिसे सुखसे समय बीतेगा। कहा है—
परस्परस्य मर्माणि ये न रक्षन्ति जन्तवः ।
त एव निधनं यान्ति वल्मीकोदरसर्पवत् ॥ १९९ ॥
जो प्राणी परस्पर एक दूसरेके मर्मकी रक्षा नहीं करते वह वल्मीकिके
और पेटके भीतर सर्पकी समान नष्ट होते हैं ॥ १९९ ॥
अरिमर्दनोऽब्रवीत्,—"कथमेतत् ?" प्राकारकर्णः कथयति-
अरिमर्दन बोला,—"यह कैसे ?" प्राकारकर्ण कहता है—