पंचतन्त्रम् (सटीक - सम्पूर्ण पाँचों तन्त्र)
Panchatantra (with Commentary – All Five Tantras)
by पण्डित विष्णु शर्मा
Source: पंचतन्त्रम् (सटीक - सम्पूर्ण पाँचों तन्त्र) · श्रीवेङ्कटेश्वर स्टीम प्रेस, बम्बई · 1910 (origin)
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Read in contextभाषाटीकासमेतम् । (३५३)
अन्तरायः स्यात् तदाहमपि न शक्नोमि गोयुगमपहर्तुम् ।
अतः प्रथमं मया अपहृते गोयुगे पश्चात् त्वया ब्राह्मणो भक्ष-
यितव्यः” । इत्थं च अहमहमिकया तयोर्विषदतोः समुत्पन्ने
द्वैधे प्रतिरववशाद् ब्राह्मणो जजागार। अथ तं चौरोऽब्रवीत्-
“ब्राह्मण ! त्वामेव अयं राक्षसो भक्षयितुमिच्छति”। राक्षसो-
ऽपि आह-“ब्राह्मण ! चौरोऽयं, गोयुगं ते अपहर्तुमिच्छति”।
एवं श्रुत्वा उत्थाय ब्राह्मणः सावधानो भूत्वा इष्टदेवतामन्त्रा-
ध्यायेन आत्मानं राक्षसाद् उद्गूर्णलगुडेन चौरात् गोयुगं ररक्ष।
अतोऽहं ब्रवीमि-
किसी स्थानमें दरिद्र द्रोणनाम ब्राह्मण प्रतिग्रह मात्र जीविकावाला निरन्तर
श्रेष्ठ वस्त्रानुलेपन गंध माला अलकार ताम्बूलादि भोगसे हीन बढेहुए केश
दाढी मूछ नखरोमसे युक्त शीत उष्ण वात वर्षासे शोषित शरीर था । उसको
किसी यजमानने कृपाकर दो बछडे दिये । ब्राह्मणने उन दोनो बछडोंको बाल्यक-
पनसेही मागे हुए घी तेल घास आदिसे बढाकर पुष्ट किया । उनको देख सह-
साही कोई चोर विचारने लगा—“मैं इस ब्राह्मणके दोनो बछडे चुराऊगा” ।
ऐसा विचार रात्रिमें बन्धनरज्जु लेकर जब चला तब तक आधे मार्गमें पृथक्
तीक्ष्ण दांतोंकी पंक्तिवाला, ऊंचे नासिका वशसे युक्त, उज्ज्वल लाल नेत्र, पुष्ट हैं
नाडीसमूह जिसका ऐसा, नत शरीर, सूखे कपोल, सम्यक् हुत हुए अग्निके सदृश
पिङ्गल दाढी मूछों और शरीरवाला कोई देखा । देखतेही उसको बडे भयसे
व्याकुल हुआभी चोर बोला,—“तुम कौनहै ?” वह बोला—“मैं सत्य वचन
ब्रह्मराक्षस हू । तुमभी अपनेको कहो”। वह बोला--“मैं क्रूर कर्मा चोर हूं। दरिद्र
ब्राह्मणके दो बैल चुराने जाता हूं”। तब विश्वासको प्राप्तहो राक्षस बोला-
“भद्र ! मैं छठे समय भोजन करनेवाला हू । इस कारण आज उसी ब्राह्मणको
भक्षण करूंगा । यह अच्छी बात है जो हम तुम दोनो एकही कार्यमें हैं” ।
तब वे दोनो वहा जाकर एकान्तमें समय देखते स्थित रहे । ब्राह्मणके सोनेपर
उसके भक्षणके निमित्त जाते हुए राक्षसको देखकर चोर बोला,—“भद्र ! यह
न्याय नहीं है । जो कि मेरे बैलोंको हरण करनेके पीछे तुम इस ब्राह्मणको भक्षण
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