पंचतन्त्रम् (सटीक - सम्पूर्ण पाँचों तन्त्र)
Panchatantra (with Commentary – All Five Tantras)
by पण्डित विष्णु शर्मा
Source: पंचतन्त्रम् (सटीक - सम्पूर्ण पाँचों तन्त्र) · श्रीवेङ्कटेश्वर स्टीम प्रेस, बम्बई · 1910 (origin)
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Read in contextभाषाटीकासमेतम्। ( ३२७ )
होनेमें पशु लेनेके लिये किसी ग्रामान्तरमें जाकर किसी यजमानसे याचना की
“भो यजमान ! आनेवाली अमावास्याको मैं यज्ञ करूंगा सो मुझे एक पशु दो"।
तब उसने उसको शास्त्रोक्त पुष्ट शरीर एक पशु दिया। वह भी उसे समर्थ इधर
उधर जाता देखकर कन्धेपर रख शीघ्र अपने पुरकी ओरको चला। तब उसके
मार्गमें जाते तीन धूर्त भूखसे व्याकुल सन्मुख हुए। उन्होंने इस प्रकार पुष्ट
शरीर स्कन्धेपर आरूढ उसको देखकर परस्पर कहा,—“अहो ! इस पशुके
भक्षणसे आजका जाडा व्यर्थ किया जाय। सो इसको वंचित कर पशुले
शीतसे (अपनी) रक्षाकरें”। तब उनमेंसे एक अपना वेश बदलकर सामने
उसकीओर कुमार्गसे आकर उस अग्निहोत्रीसे बोला,-“भो भो निर्बोध अग्नि-
होत्री ! क्यो यह सज्जनोंके विरुद्ध हास्यका कार्य करते हो जो यह अपवित्र
सारमेय कन्धेपर चढाये लिये जाते हो। कहा है कि-
श्वानकुक्कुटचाण्डालाः समस्पर्शाः प्रकीर्त्तिताः।
रासभोष्ट्रौ विशेषेण तस्मात्तान्नैव संस्पृशेत् ॥ ११८ ॥”
श्वान, कुक्कुट, चाण्डाल यह समान स्पर्शवाले हैं विशेष कर गधा और ऊटभी,
इस कारण इनको स्पर्श न करें ॥ ११८ ॥”
ततश्च तेन कोपाभिभूतेन अभिहितम्,-“अहो! किमन्धो
भवान् ? यत् पशुं सारमेयं प्रतिपादयसि”। सोऽब्रवीत,-
“ब्रह्मन् ! कोपः त्वया न कार्य्यः। यथेच्छया गम्यताम्"इति।
अथ यावत् किञ्चित् अध्वनोऽन्तरं गच्छति, तावत् द्वितीयो
धूर्त्तः सम्मुखे समुपत्य तमुवाच,-“भो ब्रह्मन् ! कष्टं कष्टं
यद्यपि वल्लभोऽयं ते मृतवत्सः, तथापि स्कन्धमारोपयि-
तुमयुक्तम्। उक्तञ्च यतः-
तब उसने क्रोध कर कहा—“अरे ! क्या तू अन्धा है ? जो पशुको कुत्ता
कहता है”। वह बोला,-“ब्रह्मन् आप क्रोध न करो यथेच्छ जाइये”। जबतक
वह कुछ और दूर गये तबतक दूसरा धूर्त सामनेसे आकर उससे बोला,-“भो
ब्रह्मन् ! खेद हे २ यद्यपि यह मरा हुआ गौका बच्चा तुम्हारा प्रियहै तो भी कन्धेप
रखना अयुक्त है। कहा भी है-