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पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)

पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)

Panchadashi by Swami Vidyaranya

by स्वामी विद्यारण्य

Source: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन · 1940 (origin)

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DevanagariSanskritpublished726 pages

Page 618 of 726

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Page 618

३० पंचदशी

जिन महावाक्यों का उल्लेख है वे सभी प्राणियों के अन्दर गुप्तभाव
से रहनेवाले 'पूर्ण अहं' का वर्णन करनेवाले हैं। क्षुद्र अहं ने
जीवात्माओं को संकुचित कर रखा है। विचार की आँच से
जब क्षुद्र अहं जल जाता है तब वही पूर्ण अहं प्रत्यक्ष दर्शन दे
देता है। आंख का पलक खुलते ही जैसे अनन्त आकाश आंखों
के सामने आ खड़ा होता है इसी प्रकार क्षुद्र अहं को हटाते ही
अनन्त आत्मतत्व साधक को दीखने लग पड़ता है। उसी पुण्य-
कीर्ति अवस्था की ओर संकेत करनेवाले ये महावाक्य हैं।
जितने भी वेदादि सच्छास्त्र हैं वे इसी पूर्ण अहं की आवाजें हैं।
मनन में गहरे उतरे हुए लोगों को ही ऐसी ईश्वरीय आवाजें सुनाई
पड़ा करती हैं। इसी कारण वेदों को 'अपौरुषेय' कहा जाता है।
वेदों को कोई पुरुष बनाता नहीं किन्तु ये तो शुद्ध मन से सुनने
की बातें हैं। इसी लिये वेदों को ऋषियों के द्वारा प्रकट होना
बताया जाता है। इस प्रकरण में जिन 'महावाक्यों' का वर्णन है
उनकी मृतप्राय आवाजें जनसाधारण के हृदयों में भी सुनाई तो
पड़ती हैं, परन्तु वे अपने क्षुद्र अहंकार के परवश होने के कारण
इनको अनसुनी कर देते हैं। सभी प्राणी अपने जी में अपने
आप को बड़े से बड़ा और अच्छे से अच्छा मानते हैं। सभी को
अपना आपा सर्वगुणसम्पन्न और सब से अच्छा, प्रतीत होता है।
सभी अवसर पाते ही अपनी बड़ाई बघारने से चूकते नहीं हैं।
परन्तु ऐसी सर्वहृदयेश्वरी महत्ता का जो गुप्त कारण है उसका
किसी को भी पता नहीं है। हम तो इसी गुप्त महत्ता को ही
सोया पड़ा हुआ 'अहं ब्रह्मास्मि' कहते हैं। अन्दर जो निःशब्द
भाषा में 'अहं ब्रह्मास्मि' की अखण्ड रटना चल रही है, उसी से
यह प्राणी अपने को सर्वोत्तम समझ रहा है। हमारे रोम रोम में