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पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)

पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)

Panchadashi by Swami Vidyaranya

by स्वामी विद्यारण्य

Source: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन · 1940 (origin)

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DevanagariSanskritpublished726 pages

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Page 617

महावाक्यविवेक का संक्षेप

'महाश्रोत्रिय' 'महाराजा' 'महायात्रा' 'महाप्रस्थान' 'महा-
ज्ञानी' आदि जैसे शब्द हैं वैसा ही यह 'महावाक्य' भी है।
इसका एक यह भी अर्थ हो सकता है कि—जिस से बड़ा, जिससे
व्यापक अर्थ वाला कोई अन्य वाक्य न हो सकता हो। दूसरा
अर्थ यह भी हो सकता है कि—जिसके पश्चात् दूसरा वाक्य
बोलना ही पड़ता हो। या यों कहो कि बोलने की आवश्यकता
ही न रह जाती हो। जो प्राणी दिन रात बहिर्मुख बने रहते हैं,
जो प्राणी आठों पहर इन्द्रियद्वारों पर ही डटे रहते हैं, उनमें से
कोई जब किसी नाटक के नटों, या पालतू तोते मैनाओं के समान
इन महावाक्यों को बोल उठे तो उसकी बात हम नहीं कहते हैं।
हम तो केवल उन महामना मुनियों की ओर को संकेत करना
चाहते हैं, जिनके हृदयधाम में धधकती हुई ज्ञानाग्नि की ज्वाला
में सृष्टि के पदार्थों की स्वाधीन सत्ता सरकण्डे की रूई के समान
भड़भड़ा कर भस्म हो चुकी हो। वे जब अपने एकान्त हृदय-
मन्दिर के मौनप्रदेश में बैठकर इन वाक्यों को बोल बैठते हैं
और जब उनके हृदय-प्रदेश में सदा के लिये सन्नाटा छा जाता
है—जिसके बाद एक भी अन्यर्थ वाक्य ऐसा सुनाई नहीं पड़ा
सकता जो उनके उस गंभीर सन्नाटे को कभी भी भंग कर सकता
हो, तब इन वाक्यों को 'महावाक्य' कहना बड़े ही गौरव की
बात प्रतीत होती है। यह प्रकरण आगमप्रधान है—इसमें कुतर्क
और व्यर्थ विवाद को थोड़ा सा भी अवकाश नहीं है। इसमें