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पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)

पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)

Panchadashi by Swami Vidyaranya

by स्वामी विद्यारण्य

Source: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन · 1940 (origin)

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DevanagariSanskritpublished726 pages

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प्राक्कथन
पंचदशी से हमारे प्रथम परिचय को आज लगभग इक्कीस वर्ष बीत
चुके हैं। यह हमारा अहोभाग्य है कि परिचय कराने में मध्यस्थता का
काम प्रातःस्मरणीय श्री अच्युत मुनि जी ने किया था। उसी वर्ष उनके
मुख से इस ग्रन्थ को आद्योपान्त पढ़ लेने का सुअवसर भी हाथ लग
गया था। तब से अब तक इस पर बीसों बार मनन हुआ है। यह
विशेषता रही है कि मनन की प्रत्येक आवृत्ति में अन्य आध्यात्मिक ग्रन्थों
के समान यह ग्रन्थ भी गंभीर गंभीरतर और गंभीरतम ही होता चला
जा रहा है। और आगे को होने की आशा भी है। ऐसा मालूम होता है कि
जैसे हमारा एक तो यह स्थूल शरीर है, दूसरा सपने में या विचाररत
होने की अवस्था में काम आने वाला सूक्ष्म शरीर होता है, तीसरा इन
दोनों को इनके बाह्य रूप देने वाला कारण शरीर होता है, ठीक इसी
प्रकार प्रत्येक विचार के भी क्रम से स्थूल सूक्ष्म और कारण शरीर होते
हैं। ज्यों ज्यों प्राणी का अनुभव बल बढ़ता जाता है,त्यों त्यों विचारों के
अन्दर के शरीरों में प्रवेश करने का अधिकार उसे मिलता जाता है—विचारों
के अन्तरात्मा के दर्शन उसे मिलने लगते हैं। यों साधारण रूप से किसी
बात को सुन लेने पर उसका सार समझ में नहीं आता। अनुकूल
परिस्थिति आजाने पर, जब उस बात के प्राण तक—उसके सार तक—
दृष्टि जा पहुँचती है, तब वही साधारण सी बात विचारक के जीवन की
बहुमूल्य सम्पत्ति बन जाती है। विचारों का जो कारण शरीर है, वही तो
अनुभव है। जिन विचारों के पीछे अनुभव का बल नहीं होता, वे विचार
निस्तेज, अकार्यकारी और प्रभावहीन रह जाते हैं। विचारों में प्रभाव-
शालिता, तेजयुक्तता और कार्यकारिता आने के लिए यह आवश्यक
है कि उन की पीठ पर अनुभव का हाथ रक्खा हुआ हो। इसी बात
को दूसरे शब्दों कहें तो कोरे ज्ञानवृत्त होने से काम नहीं चलता