पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)
Panchadashi by Swami Vidyaranya
by स्वामी विद्यारण्य
Source: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन · 1940 (origin)
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Read in context१० पञ्चदशी
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पदार्थ, सपने के पदार्थों की तरह, क्षण भर में अदृश्य (गुम.) हो
जाते हैं। इसी प्रकार यह समझें कि इस संसार का भी जो तत्त्व
है, अर्थात् जो इस संसार का अनारोपित स्वरूप है वह तो एक
ही है और वह भी छिप सा रहा है। वह 'सत्य' 'ज्ञान' और
'परमानन्द' स्वरूप है। परन्तु इस तत्त्व के ऊपर जो अनेक
प्रकार के आरोप होगये हैं, इस तत्त्व के आधार से जो कि अनेक
कल्पित देह, इन्द्रिय, मन, बुद्धि तथा अन्य भूत भौतिक पदार्थ
प्रतीत होने लग पड़े हैं, उन्होंने हमारा सारा ही ध्यान अपनी
ओर खींच लिया है और अब हमें सर्वत्र 'असत्य' 'अज्ञान' और
दुःखों के ढेर ही ढेर दिखाई पड़ रहे हैं। जैसे रस्सी का सांप,
सारा ध्यान अपनी ओर खींचकर रस्सी को प्रतीत होने ही नहीं
देता है, इसी प्रकार इन कल्पित पदार्थों ने तत्त्व की प्रतीति को
रोक दिया है और स्वयं हमारे सामने आकर खड़े हो गये हैं।
सांप को देखकर जैसे भय और कम्प आदि हो जाते हैं; इसी
प्रकार इन देहादि पदार्थों को देखने से अब तो जन्म मरण आदि
का चक्र चल पड़ा है। हम अभागे प्राणी जन्मने के लिये मरते
हैं और मरने के लिये जन्म लेते हैं। भोग के लिये कर्म करते
हैं और कर्म करने के लिये भोगते हैं। यों हम अज्ञानोपहत होकर
मूर्ख बालकों की तरह इस चक्कर को निरन्तर घुमाते ही जाते
हैं। जब पुण्यपरिपाक से किसी तत्त्व के पारखी से भेंट हो
जाती है और वह कृपा करता है तब इन कल्पित चीज़ों की
पहचान होकर, अकल्पित सच्चिदानन्द वस्तु पर साधक की
दृष्टि जा पड़ती है और बस तभी संसरण बन्द हो जाता है।
कारुणिक आचार्य तत्त्व (अकल्पित पदार्थ) का जो स्वरूप है
वह बता देते हैं। तब उस पर मनन चल पड़ता है और मनन