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पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)

पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)

Panchadashi by Swami Vidyaranya

by स्वामी विद्यारण्य

Source: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन · 1940 (origin)

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DevanagariSanskritpublished726 pages

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तत्त्वविवेक का संक्षेप ९
हमें जो कि आत्मविषयक ज्ञान होता है उसे तो परोक्ष ज्ञान ही
समझना चाहिए। परन्तु यह जो अपरोक्ष ज्ञान है यह जब किसी
को होता है तब उसका संसार का कारण मूलाज्ञान भी जल-
भुन कर खाक हो जाता है।
ऐसा तत्वविवेक जब कोई कर लेगा और अपने मन को
इसी लक्ष्य की महादीक्षा भी दे देगा, तब उसे अपरोक्ष ज्ञान
होकर ही रहेगा। उसका संसार-बन्धन टूट फूट कर शतधा
विदीर्ण हो जायगा। फिर परम पद को पाने में उसे क्षण भर
का भी विलम्ब नहीं होगा। चाह तो उसे यह भी कह सकते हैं
कि वह सच्चिदानन्द स्वरूप ब्रह्म ही हो जायगा।
गंभीर सूचना
जो तत्त्व है अर्थात् जो अनारोपित ( अकल्पित ) वस्तु है उस
का दिग्दर्शन इस प्रकरण में कराया गया है। इस प्रकरण का
गंभीर अभिप्राय यह है कि एक ही स्थान पर दो अकल्पित पदार्थ
रह ही नहीं सकते हैं। एक स्थान पर अकल्पित पदार्थ तो एक
ही ठहर सकता है यह एक सर्वमान्य नियम है। जहां एक
अकल्पित ( सच्ची ) रस्सी पड़ी है, वहां ही पर दूसरा अकल्पित
(सच्चा) सांप भी हो यह हो ही नहीं सकता। हां, यह तो हो
सकता है कि जहां पर सच्ची रस्सी हो वहीं पर कल्पित सांप भी
रह रहा हो। सच्चे और कल्पित का एक साथ होना तो भ्रमस्थल
में प्रत्यक्ष देखते ही हैं। जहाँ जहाँ भी हमको कल्पित पदार्थ
प्रतीत हुआ करते हैं वहाँ-वहाँ उनका तत्त्व अर्थात् उनका अनारोपित
स्वरूप उनके साथ तो रहता ही है परन्तु वह उस समय छिप सा
जाता है। उस पदार्थ के तत्त्व को यदि हम जान लें, तो कल्पित