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पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)

पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)

Panchadashi by Swami Vidyaranya

by स्वामी विद्यारण्य

Source: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन · 1940 (origin)

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DevanagariSanskritpublished726 pages

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ब्रह्मानन्दे विद्यानन्दप्रकरणम् ५५१
जो अज्ञानी होने के कारण ही दुःखी हैं, वे पुत्र स्त्री आदि
की चाह में फंस कर, संसाररूपी झाड़ में उलझे पड़े रहें। मैं
भी कभी ऐसा उलझा पड़ा था परन्तु यह तो बताओ कि परमा-
नन्द से परिपूर्ण मैं भला अब कौनसी इच्छा से संसाररूपी
चक्कर पर चढ़कर घूमता रहूँ ? ॥४२॥ जिन अज्ञानियों को पर-
लोक यात्रा में मज़ा आता हो वे [अपने वहम को पूरा करने
के लिये] भले ही कर्म किया करें। परन्तु यह तो बताओ कि
जो मैं सर्वलोकस्वरूप हो चुका हूँ वह मैं अब इन कर्मों को किस
लिये करूँ और कैसे करूँ ? ॥४३॥
व्याचक्षतां ते शास्त्राणि वेदानध्यापयन्तु वा ।
येऽत्राधिकारिणो मे तु नाधिकारोऽक्रियत्वतः ॥४४॥
जो अधिकारी हैं वे लोग चाहे शास्त्रों पर टीकायें लिखें
या वेदों को पढ़ायें परन्तु मुझ अक्रिय का तो कोई अधिकार ही
नहीं रह गया है ।
निद्राभिक्षे स्नानशौचे नेच्छामि न करोमि च ।
द्रष्टारश्चेत् कल्पयन्ति किं मे स्यादन्यकल्पनात् ॥४५॥
सोना और भिक्षा स्नान तथा शौच की न मुझ आत्मा को
कुछ आवश्यकता है और न मैं यह सब कुछ करता ही हूँ [यह
तो सब यह शरीर ही किया करता है] फिर भी यदि देखने वाले
संसारी लोग इन सब को मुझ में ही मानते हैं तो वे माना करें ।
दूसरों के मान लेने से मुझ में क्या हो जायगा ? तृप्तिदीप के
२५८ वें श्लोक में इसकी विस्तृत व्याख्या की गई है ।
गुंजापुंजादि दह्येत नान्यारोपितवन्हिना ।
नान्यारोपितसंसारधर्मानैवमहं भजे ॥४६॥