पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)
Panchadashi by Swami Vidyaranya
by स्वामी विद्यारण्य
Source: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन · 1940 (origin)
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Read in contextपञ्चभूतविवेकप्रकरणम् ३७
वैराग्य, क्षमा, उदारता इत्यादि मनोविकार सत्व गुण के
हैं। काम, क्रोध, लोभ, तथा यत्न आदि विकार रजोगुण से उत्पन्न
हो जाते हैं ॥१४॥ आलस्य, भ्रान्ति तथा तन्द्रा आदि विकार
तमोगुण से उठा करते हैं। सात्विक विकारों से पुण्य की निष्पत्ति
होती है। राजस विकारों से पाप की उत्पत्ति होती है ॥१५॥
तामस विकारों से पुण्य या पाप कुछ भी नहीं होता। किन्तु व्यर्थ
ही आयु के दिन कट जाते हैं। इन सब [ज्ञानेन्द्रियों, कर्मेन्द्रियों,
प्राणों तथा अन्तःकरणों] में से 'मैं' भाव करने वाले को 'कर्ता'
अर्थात् प्रभु [मालिक] कहा जाता है। क्योंकि लोक में भी कार्य
करने वाले को ही प्रभु कहा जाता है।
स्पष्टशब्दादियुक्तेषु भौतिकत्वमतिस्फुटम् ।
अक्षादावपि तच्छास्त्रयुक्तिभ्यामवधार्यताम् ॥१७॥
जिन वस्तुओं में शब्दस्पर्शादि गुण स्पष्ट ही दीख रहे हैं वे तो
स्पष्ट ही भौतिक हैं। जो इन्द्रियां दृष्टिगोचर नहीं होती हैं, उनके
भौतिक होने का निश्चय शास्त्र तथा युक्ति से कर लेना चाहिये।
'अन्नमयं हि सोम्य मनः आपोमयः प्राणः तेजोमयी वाक्'
मन अन्न से बना है, प्राण जलमय है, वाणी अग्निमयी है इत्यादि
शास्त्र से इन्द्रियों का भौतिक होना सिद्ध होता है। जब हम बहुत
दिनों तक नहीं खाते तब मन आदि सभी इन्द्रियां अपना अपना
कार्य करने में असमर्थ हो जाती हैं, जब फिर खाने लगते हैं तब
फिर हरी-भरी हो जाती हैं, इस युक्ति से भी मन आदि इन्द्रियों
का भौतिक होना सिद्ध होता है।
एकादशेन्द्रियैर्युक्त्या शास्त्रेणाप्यवगम्यते ।
यावत्किञ्चिद्भवेदेतदिदंशब्दोदितं जगत् ॥१८॥