Skip to content
SarvaKosh
पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)

पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)

Panchadashi by Swami Vidyaranya

by स्वामी विद्यारण्य

Source: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन · 1940 (origin)

Report a copyright issue

DevanagariSanskritpublished726 pages

Page 54 of 726

Read in context
Page 54

३६ पञ्चदशी
वाक्, पाणि, पाद, पायु तथा उपस्थ नाम की इन्द्रियों से उन
उन क्रियाओं की उत्पत्ति होती हैं। इन क्रियाओं के द्वारा ही इन
कर्मेन्द्रियों का अनुमान होता है। मुख, कर, चरण, गुदा तथा उपस्थ
नाम के गोलकों में ये पाँचों कर्मेन्द्रियाँ निवास किये रहती हैं।
मनो दशेन्द्रियाध्यक्षं हृत्पद्मगोलके स्थितम् ।
तच्चान्तःकरणं, बाह्येष्वस्वातन्त्र्याद्दिनेन्द्रियैः ॥१२॥
अक्षैश्चार्थापिंतेष्वेतद् गुणदोषविचारकम् ।
सत्वंरजस्तमश्चास्य गुणा, विक्रियतं हि तैः ॥१३॥
इन दसों इन्द्रियों का प्रेरक मन तो हृदय के पद्माकार गोलक
में रहता है। उसको अन्तःकरण अर्थात् अन्दर की इन्द्रिय कहते
हैं। क्योंकि वह इन्द्रियों के बिना बाह्य विषयों में स्वतन्त्र नहीं
होता ॥१२॥ इन्द्रियों को जब विषयों में भेज दिया जाता है तब
यह मन उन विषयों के गुण दोष का विचार किया करता है [कि
यह विषय अच्छा है या बुरा] सत्व, रज तथा तम ये तीनों इस
मन के गुण हैं। क्योंकि इन गुणों के कारण यह मन विकार को
प्राप्त होता [बदलता] रहता है। [इन तीनों गुणों के कारण वैराग्य
काम तथा निद्रा आदि अनेक वृत्तियां उत्पन्न हो जाती हैं और
मन को विकृत कर देती हैं]
वैराग्यं क्षान्तिरौदार्यमित्याद्याः सत्वसंभवाः ।
कामक्रोधौ लोभयत्नावित्याद्या रजसोत्थिताः ॥१५॥
आलस्यभ्रान्तितन्द्राद्या विकारास्तमसोत्थिताः ।
सात्विकैः पुण्यनिष्पत्तिः पापोत्पत्तिश्च राजसैः ॥१६॥
तामसैर्नोभयं किन्तु वृथायुः क्षपणं भवेत् ।
अत्राहंप्रत्ययी कर्तेत्येवं लोकव्यवस्थितिः ॥१७॥