पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)
Panchadashi by Swami Vidyaranya
by स्वामी विद्यारण्य
Source: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन · 1940 (origin)
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Read in contextब्रह्मानन्दे अद्वैतानन्दप्रकरणम् ५१९
परिणामे पूर्वरूपं त्यजेत् तत् क्षीररूपवत् ।
मृत्सुवर्णे निवर्तेते घटकुण्डलयो र्न हि ॥४९॥
[घट को मिट्टी का परिणाम नहीं मान सकते क्योंकि।]
जिन दुग्धादि में परिणाम माना जाता है, उन में तो पूर्वरूप का
त्याग कर दिया जाता है। [परन्तु विवर्त के उदाहरण ] घट
और कुण्डल के बन जाने पर भी उनके उपादान कारण मिट्टी
और सुवर्ण, उन में से निवृत्त नहीं हो जाते हैं। [यह बात लोक
में प्रसिद्ध ही हैं]।
घटे भग्ने न मृद्भावः कपालानावेक्षणात् ।
मैवं चूर्णेऽस्ति मृद्रूपं स्वर्णरूपं त्वतिस्फुटम् ॥५०॥
[यदि कहो कि—] घट के टूट जाने पर तो मृद्भाव नहीं
पाया जाता। क्योंकि घट के फूट जाने पर तो कपाल देखे
जाते हैं। तो हम कहेंगे कि यह कथन ठीक नहीं। क्योंकि
चूरा हो जाने पर—जबकि कपाल भी नहीं रहते तब—मिट्टी
को देखा जा सकता है। इस कारण घट को मिट्टी का विवर्त
ही मानना चाहिये। सोने में तो यह आक्षेप चल भी नहीं
सकता क्योंकि कुण्डल आदि के टूट जाने पर भी सोने का
स्वरूप तो अत्यन्त स्पष्ट दीखता ही रहता है।
क्षीरादौ परिणामोऽस्तु पुनस्तद्भाववर्जनात् ।
एतावता मृदादीनां दृष्टान्तत्वं न हीयते ॥५१॥
जब दूध का दही बन जाता है तब फिर वह लौट कर दूध
नहीं बन सकता। इस कारण क्षीरादि में तो परिणाम मानना
पड़ता है परन्तु इतने मात्र से [क्षीरादि के परिणामी होने से ]
मिट्टी आदि के विवर्त का दृष्टान्त होने में कुछ बिगड़ नहीं जाता।