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पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)

पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)

Panchadashi by Swami Vidyaranya

by स्वामी विद्यारण्य

Source: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन · 1940 (origin)

DevanagariSanskritpublished726 pages

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Page 540

५१८ पञ्चदशी

मुख किए हुए जो आदमी दीखता है वह वस्तुतः नहीं होता ।
क्योंकि ज्ञानी या अज्ञानी कोई भी उस छायापुरुष को, किनारे
पर खड़े हुए पुरुष की तरह, कभी कहीं भी सत्य नहीं मान लेता
[वह समझ लेता है कि जलरूपी उपाधि के कारण ऐसा प्रतीत
हो रहा है। जब तक जलरूपी उपाधि बनी है तब तक ऐसी
मिथ्या प्रतीति होती ही रहेगी। इसी प्रकार सर्वकारण आत्म-
तत्त्व का ज्ञान हो जाने पर, विवेकी पुरुष इस जगत् को मिथ्या
मान लेता है। उसके बाद फिर जब उसे यह जगत् भासता
है तब वह इसे इन्द्रियोपाधिक भ्रम समझ कर टालता रहता
है। वह जान लेता है कि जब तक ये इन्द्रियें बनी हैं, तब तक
ऐसी प्रतीति होती ही रहेगी। वह फिर इसको सत्य मानकर
कोई व्यवहार नहीं करता । सोपाधिक भ्रमों का यही हाल
होता है।]
ईदृग्बोधे पुमर्थत्वं मतमद्वैतवादिनाम् ।
मृद्रूपस्यापरित्यागाद् विवर्तत्वं घटे स्थितम् ॥४८॥
ऐसा बोध हो जाने को ही अद्वैतवादी पुरुषार्थ मानता है।
[उसके मत में आनन्दात्मा से भिन्न सभी कुछ को मिथ्या समझ
लेने पर ही अद्वितीय आनन्द की अभिव्यक्ति हो सकती है ]
जब तक सांसारिक पदार्थों के सत्य होने की वासना नहीं टल
जाती तब तक अद्वैतानन्द प्रकट होता ही नहीं। देखो, घट की
मिट्टी ने, घट बन जाने पर भी, अपने मृद्रूप का परित्याग नहीं
किया है, इस कारण यह घट मिट्टी का विवर्त है। [यही कारण
है कि मिट्टी का ज्ञान हो जाने पर घट के सत्यत्व की बुद्धि
निवृत्त हो जाती है]