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पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)

पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)

Panchadashi by Swami Vidyaranya

by स्वामी विद्यारण्य

Source: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन · 1940 (origin)

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DevanagariSanskritpublished726 pages

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( ख )
हे अच्युत ! हे अनन्त ! अपने ही ऊपर दाव लेकर दब मरने वाले
अनाड़ी पहलवान की तरह, अपनी जीवनसमस्या को सुलझाने के लिए
ही किए गए अपने ही प्रयत्नों से, बीते हुए अनन्त जन्मों में, मैंने इस अपनी
जीवनसमस्या को उलझाया ही उलझाया है। मैंने अपने प्रत्येक उद्योग
से इस जीवनसमस्या को शरीर और उसके उपकरणों में अनन्त गाँठें लगा
लगा कर बांधा है। मैंने सर्वव्यापक सर्वभूतसाधारण जीवनरस को केवल
शरीर के द्वारा ही अपने पास फटकने दिया है और इसी काम में अपना
सम्पूर्ण बुद्धिवैभव व्यय किया है। मैंने अपने सर्वव्यापक तथा घट-
घटवासी जीवनतत्व को सर्वव्यापक रूप में अनुभव न कर सकने के
प्रत्येक संभव उद्योग किए हैं। संक्षेप में कहें तो अपने सर्वव्यापक सर्वभूत-
गुहाशय जीवनतत्व को शरीरमात्र में ही संकुचित करके रखने में मैंने कोई
भी कसर अपनी ओर से उठा नहीं रक्खी है। आप जगदात्मा के अनन्त-
पने के साथ विद्रोह करने में ही मैं अब तक अपनी सम्पूर्ण शक्ति और
सम्पूर्ण उत्साह को व्यय करता रहा हूँ और इसी निर्दय कर्म से मैं अपने
को धन्य भी मानता रहा हूँ। परन्तु सम्पूर्ण प्राणियों के हृदय में जो कि
सत्यान्वेषण का एक अखंड परन्तु अज्ञात आग्रह रहा करता है—जो कि
प्राणी से पहली अवस्था और वस्तु को छुड़ा छुड़ा कर दूसरी अवस्था
और दूसरी दूसरी वस्तुओं को सदा ही ग्रहण कराता जाता है—जब तक
सत्य की प्राप्ति नहीं हो चुकती तब तक जो इस प्रकार के प्रयत्नों को कभी
भी विश्राम लेने नहीं देता है—उसी मेरे अज्ञात आग्रह ने मुझे भी मेरे
इस संकुचितपने के विरुद्ध—जीवनरस को शरीरमात्र में संकुचित मान
रखने के विरुद्ध—विद्रोह करने पर विवश कर डाला है। जीवनतत्व को
शरीरमात्र में संकुचित मान लेने से तीनों प्रकार के तापों के जो अनगिनत
आक्रमण मुझे सहने पड़े हैं, उन आक्रमणों ने जो जो मूक सूचनाएं मेरे
हृदयपटल पर लिख डाली हैं, मेरी बहती हुई जीवनधारा के सामने