पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)
Panchadashi by Swami Vidyaranya
by स्वामी विद्यारण्य
Source: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन · 1940 (origin)
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Read in contextॐ
कूटस्थदीपप्रकरणम्
खादित्यदीपिते कुड्ये दर्पणादित्यदीप्तिवत् ।
कूटस्थभासितो देहो धीस्थजीवेन भास्यते ॥१॥
जो भित्ति पहले सूरज से दीपित हो रही है, उसी भित्ति पर
जैसे दर्पण में के सूरज की दूसरी दीप्ति भी जा पड़ती हो,
[और वह भित्ति दो प्रकाशों से चमक उठती हो] उसी प्रकार
[पहले] कूटस्थ [अविकारिचैतन्य] से भासित भी यह देह
[फिर दुबारा] बुद्धिस्थ चिदाभास से भी भासित हुआ करता है।
सूर्य के प्रकाश से जो भित्ति अभी तक सामान्यतया
प्रकाशित हो रही थी, दर्पण पर गिर कर लौट कर भित्ति पर
पड़ी हुई सूर्य की रश्मि फिर जैसे उसी भित्ति को विशेषतया
प्रकाशित किया करती है, इसी प्रकार निर्विकार चैतन्य ने इस
देह को सामान्यतया प्रकाशित तो कर ही रक्खा है, उसे ही
यह बुद्धिस्थ चिदाभास फिर दुबारा विशेष रूप से प्रकाशित
किया करता है। यों देह को प्रकाशित करने वाले दो चैतन्य
हैं—। एक सामान्य चेतन दूसरा विशेष चेतन।
अनेकदर्पणादित्यदीप्तीनां बहुसन्धिषु ।
इतरा व्यज्यते, तासामभावेऽपि प्रकाशते ॥२॥
यदि एक ही भित्ति पर अनेक दर्पणों के आदित्यों के
आभास [प्रभा-अक्स] डाले जांय, तो उन आभासों किंवा