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पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)

पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)

Panchadashi by Swami Vidyaranya

by स्वामी विद्यारण्य

Source: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन · 1940 (origin)

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DevanagariSanskritpublished726 pages

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Page 334

३१४ पञ्चदशी

यही धुन सवार रहती थी किन्तु अब] अक्रिय तत्व हो जाने के
कारण मेरा तो इन किन्ही भी कामों में अधिकार नहीं रहा है।
निद्राभिक्षे स्नानशौचे नेच्छामि न करोमि च।
द्रष्टारश्चेत् कल्पयन्ति किं मे स्यादन्यकल्पनात् ॥२५८॥
निद्रा और भिक्षा स्नान और शौच की मुझ आत्मतत्व को
न तो इच्छा ही है और न मैं यह सब कुछ करता ही हूँ। फिर
भी यदि संसारी लोग मुझ में ये सब कुछ मानते हैं तो वे
माना करें। उनके मानने से मुझ में क्या होना है। [मेरी
उदार दृष्टि में तो अब यह कुछ भी नहीं है]।
उनको मेरा शरीर दीखता है, इसकी क्रियाओं को ये मेरी मानते
हैं। मेरे गुहा निवासी रूप की ओर इनका ध्यान नहीं है। चुम्बक
के पास आते ही लोहे में गति हो जाती है, पानी बरसते ही धरती
उसे पी जाती है। गीली मिट्टी और अनुकूल ऋतु के आते ही
बीज में अंकुर निकल आते हैं। सूरज के निकलते ही कमल खिल
जाते हैं। चन्द्रमा को देखते ही चन्द्रकान्त में द्रव हो जाता
है। गरमी अधिक पड़ते ही वर्षा होने लगती है। स्पष्ट अचेतन
समझे जाने वाले पदार्थों का यह हाल है, उसी प्रकार भूल से
चेतन समझ लिया गया यह शरीर भी, भोजन को देखकर उसे
खाने में, और भूख प्यास अधिक तंग करें तो भोजन को जुटाने
में संलग्न हो जाता है। गरमी लगे, मल की बाधा हो, तो स्नान
शौच आदि में प्रवृत्त हो जाता है। सावधान रहने का यही
प्रसंग है कि इन शरीरादियों की इन प्रवृत्तियों को अपना मान
कर वृथा ही कर्तृत्व का सारा पापरूप बोझ अनाड़ी पहलवान
के दाव की तरह, अपने ऊपर मत ले लो।