पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)
Panchadashi by Swami Vidyaranya
by स्वामी विद्यारण्य
Source: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन · 1940 (origin)
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Read in contextतृप्तिदीपप्रकरणम् ३१३
को पूरा करके जो कुछ होता, वह उन्हें बिना किये ही हो चुका
है। इस के पश्चात् अब कुछ भी कर्तव्य शेष नहीं दीखता।]
तदेतत्कृतकृत्यत्वं प्रतियोगिपुरःसरम् ।
अनुसन्दधदेवाअयमेवं तृप्यति नित्यशः ॥२५४॥
जो बातें आत्मा की कृतकृत्यता का विरोध करती रहती हैं,
उनके साथ ही अपनी कृतकृत्यता को याद कर करके,यह ज्ञानी
आगे कहे प्रकार से सदा ही तृप्त रहने लगता है।
दुःखिनोऽज्ञाः संसरन्तु कामं पुत्राद्यपेक्षया ।
परमानन्दपूर्णोऽहं संसरामि किमिच्छया ॥२५५॥
पुत्र, पत्नी आदि की मांग में फँसे हुए दुःखी अज्ञानी लोग,
भले ही संसार में जकड़े रहें [मैं भी कभी ऐसा ही था] किन्तु
अब परमानन्द से परिपूर्ण मैं भला इस संसार में किस इच्छा
को लेकर उलझा पड़ा रहूँ ?
अनुतिष्ठन्तु कर्माणि परलोकयियासवः ।
सर्वलोकात्मकैः कस्मादनुतिष्ठामि किं कथम् ॥२५६॥
जिन्हें परलोक जाने की बड़ी इच्छा है, वे भले ही यज्ञादि
शुभ कर्म करते फिरें, [मुझ पर भी कभी यही वहम सवार हो
रहा था] किन्तु सर्वलोकस्वरूप बना हुआ मैं भला अब उन
कर्मों को क्यों करूँ ? और कैसे करूँ ? यह तुम्हीं बताओ ?
व्याचक्षतां ते शास्त्राणि वेदानध्यापयन्तु वा ।
येऽत्राधिकारिणो, मे तु नाधिकारोऽक्रियत्वतः॥२५७॥
जो लोग अधिकारी हैं, उनका यदि जी करता हो तो वे
शास्त्रों का व्याख्यान करें,या वेदों को पढ़ायें