पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)
Panchadashi by Swami Vidyaranya
by स्वामी विद्यारण्य
Source: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन · 1940 (origin)
Page 325 of 726
Read in contextतृप्तिदीपप्रकरणम् ३०५
कि यह चिदाभास शरीर के ज्वरों को अपने आत्मा में आरो-
पित कर लेता है । ]
पुत्रदारेषु तप्यत्सु तपामीति वृथा यथा ।
मन्यते पुरुषस्तद्वदाभासोऽप्यभिमन्यते ॥ २३३ ॥
पुत्र या पत्नी आदि के सन्तप्त होने पर जैसे कुटुम्बी मनुष्य
वृथा ही अपने आपको दुःखी माना करता है, इसी प्रकार यह
चिदाभास भी शरीरों के दुःखी होने पर अपने आप को वृथा
ही दुःखी मानने लगता है । [शरीर में कोई चोट लग जाय तो
यह उस चोट को आत्मा को ही लगी समझता है इत्यादि ]
विविच्य भ्रान्तिमुज्झित्वा स्वमप्यगणयन् सदा ।
चिन्तयन् साक्षिणं कस्माच्छरीर मनुसंज्वरेत् ॥२३४॥
वह चिदाभास कूटस्थ का, अपने आपका, तथा शरीरों
का विवेक करके, भ्रान्ति को छोड़ देने के पश्चात्, अपने को भी
कुछ न गिनते हुए [कि मैं भी कुछ हूँ ] ज्वरादि से रहित जो
साक्षी है, उस का सदा चिन्तन करते करते, इन ज्वर वाले
शरीरों के पीछे-पीछे लग कर स्वयं भी क्यों सन्तप्त होता
फिरे ? [ यही बात विवेकी की समझ में नहीं आती। सन्तप्त
होने का तो कोई सच्चा कारण ही विवेकी को नहीं दीखता । ]
अयथावस्तुसर्पादिज्ञानं हेतुः पलायने ।
रज्जुज्ञानेऽहिधीध्वस्तौ कृतमप्यनुशोचति ॥२३५॥
रज्जु में जो सर्पादि कल्पित कर लिये जाते हैं, उनका ज्ञान
ही तो पलायन का कारण होता है। परन्तु जब रज्जु का ज्ञान हो
जाता है और सर्पबुद्धि नष्ट हो जाती है,तब तो अपने प्रथम किये