पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)

पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)
Panchadashi by Swami Vidyaranya
by स्वामी विद्यारण्य
Source: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन · 1940 (origin)
DevanagariSanskritpublished726 pages
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३०४ पञ्चदशी
को केवल प्रकाश स्वभाव वाला ही पाते हैं। [यह चिदाभास
उस चित् का ही प्रतिबिम्ब है इस कारण उसमें भी कोई ज्वर
नहीं होता]।
चिदाभासेऽप्यसंभाव्या ज्वराः, साक्षिणि का कथा।
एवमप्येकतां मेने चिदाभासो ह्यविद्यया ॥२३०॥
यों जब कि चिदाभास में भी ज्वरों का होना असंभव है
तब फिर साक्षी में ज्वर नहीं होते, इसका तो कहना ही क्या ?
वस्तुस्थिति तो यही है फिर इस चिदाभास ने अपनी अविद्या
[बेसमझी] के कारण [उन शरीरों से] अपनी एकता मान ली
है [और यह अब अपने आपको ही सन्तापशील मान
बैठा है]।
साक्षिसत्यत्वमध्यक्ष्य स्वेनोपेते वपुस्त्रये।
तत्सर्वं वास्तवं स्वस्य स्वरूपमिति मन्यते ॥२३१॥
[एकता मानने की रीति तो यह है कि] उस चिदाभास ने,
अपने से युक्त इन तीनों शरीरों में, साक्षी की सत्यता का
अध्यास किया और फिर पीछे से ज्वरों से जलते हुए उन तीनों
शरीरों को ही, अपना सच्चा रूप समझ लिया। [मानों कोई
दहकती हुई भट्टी में घुस कर उस भट्टी को ही अपना आपा
मान बैठा हो और अन्दर बैठा बैठा जल रहा हो।]
एतस्मिन् भ्रान्तिकारेऽयं शरीरेषु ज्वरत्स्वथ।
स्वयमेव ज्वरामीति मन्यते हि कुटुम्बिवत् ॥२३२॥
इस भ्रान्ति के रहते रहते जब इस चिदाभास के किसी
शरीर को कोई ज्वर होजाता है तब यह कुटुम्बी पुरुष की तरह
अपने आपको ही ज्वरशील मान बैठता है।