पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)
Panchadashi by Swami Vidyaranya
by स्वामी विद्यारण्य
Source: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन · 1940 (origin)
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Read in contextघातक हो जाता। क्योंकि यह उस अवस्था में प्रारब्ध भोग के
साधनों को ही नष्ट कर डालता। परन्तु यह ऐसा नहीं करता
है। किन्तु उसको केवल मिथ्या ही बताता है। इसी से कहते
हैं कि—यह ज्ञान प्रारब्ध कर्म का विरोधी नहीं है। किसी को
माया समझ लेने से ही उसका अपह्नव नहीं हो जाता है। इन्द्र-
जाल आदि में देखते हैं कि—स्वरूप का विलय किये बिना भी
लोग उसको मिथ्या समझ ही लेते हैं।
अनपह्नुत्य लोकास्तदिन्द्रजालमिदं त्विति।
जानन्त्येदानपह्नुत्य भोगं मायात्वधीस्तथा ॥१८०॥
देखते हैं कि—मनुष्य उस इन्द्रजाल के स्वरूप को न हटा
कर भी, यह जान लेते हैं, कि यह तो इन्द्रजाल है। ठीक इसी
प्रकार भोग्यपदार्थ को विलय किए विना भी, जगत् के मिथ्या-
पन का भान हो ही सकता है।
यत्र त्वस्य जगत् स्वात्मा पश्येत् कस्तत्र केन कम्।
किं जिघ्रेत् किं वदेद्वेति श्रुतौ तु बहु घोषितम् ॥१८१॥
तेन द्वैतमपह्नुत्य विद्योदेति न चान्यथा।
तथा च विदुषो भोगः कथं स्यादिति चेच्छृणु ॥१८२॥
जिस विद्यावस्था के आजाने पर, यह सकल जगत्, उस विद्वान्
का आत्मा अथवा स्वरूप ही हो जाता है, उस दशा में, कौन
देखने वाला ? किस साधन से ? किस पदार्थ को देखे ? किस फूल
आदि को सूंघे ? क्या कुछ बोले ? सुने ? स्पर्श करे ? यह बात श्रुति
में अनेक जगह कही गयी है। १८१॥ इस सबसे यही निश्चय होता
है कि विद्या तो द्वैत का अपह्नव करके ही उत्पन्न होती है—[वह
विद्या जब तक द्वैत का उपमर्द नहीं कर लेतीतब तक वह उत्पन्न