पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)
Panchadashi by Swami Vidyaranya
by स्वामी विद्यारण्य
Source: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन · 1940 (origin)
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Read in context२४६ पञ्चदशी
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का विरोधी होता। क्योंकि तब यह विद्या के विषय मिथ्यात्व को
स्वयं ही नष्ट कर डालता। परन्तु यह प्रारब्ध ऐसा तो कुछ भी
नहीं करता। यह तो केवल भोग ही भोग देता है। इसी कारण
कहते हैं कि प्रारब्ध, विद्या का विरोधी नहीं होता। केवल भोग
दे देने मात्र से ही कोई पदार्थ सत्य नहीं हो जाता है। [कैसे सो
अगले श्लोक में कहेंगे ]।
अनूनो जायते भोगः कल्पितैः स्वप्नवस्तुभिः ।
जाग्रद्वस्तुभिरप्येव मसत्यैर्भोग इष्यताम् ॥१७८॥
देख लो कि—स्वप्न की भी जो मिथ्यावस्तुयें होती हैं, उन
से जो भोग होता है, वह जाग्रत् के पदार्थों से किसी बात में
भी कम नहीं होता। इस दृष्टान्त से यह समझ लो कि—
जाग्रत्काल के मिथ्या पदार्थों से भी भोग मिल ही सकता है।
[सुपने के मिथ्यापदार्थों से जैसे भोग होता है, ऐसे ही मिथ्या
होने पर भी जाग्रत् के पदार्थों से भोग हो सकता है। भोग देने
के कारण से ही जाग्रत् के पदार्थों को 'सत्य कहना ठीक नहीं है।
यदि विद्यापह्नुवीत जगत् प्रारब्धघातिनी ।
तदा स्यान्नतु मायात्वबोधेन तदपह्नवः ॥१७९॥
यदि ज्ञान, जगत् का अपह्नव कर देता तो वह प्रारब्ध का
घातक हो जाता, किसी को माया समझ लेने से ही उसका
अपह्नव नहीं हो जाता।
यदि तो यह ज्ञान जगत् के भोग्य पदार्थों का अपह्नव कर
देता—दीखने वाले भोग्य पदार्थों के स्वरूप को विलीन कर देता
[जैसे कि 'नेदं रजतम्'='यह रजत नहीं' इस ज्ञान से कल्पित
रजत का स्वरूप विलीन हो जाता है] तो यह प्रारब्ध का