पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)
Panchadashi by Swami Vidyaranya
by स्वामी विद्यारण्य
Source: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन · 1940 (origin)
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Read in contextसमझ लिया है, जिसने इसे अचिन्त्यरचनारूप जान लिया
है, जिसे यह दृष्टनष्ट रूप में दीखने लगा है, वह दोषदर्शी
विवेकी भला बताओ इसमें अनुराग [प्रेम का नाता] कैसे कर
लेगा ?
स्वस्वप्नमापरोक्ष्येण दृष्ट्वा पश्यन् स्वजागरम् ।
चिन्तयेदप्रमत्तः सन्नुभावप्यनुदिनं मुहुः ॥१७२॥
चिरं तयोः सर्वसाम्य मनुसन्धाय जागरे ।
सत्यत्वबुद्धिं सन्त्यज्य नानुरज्यति पूर्ववत् ॥१७३॥
अपने स्वप्न को अपरोक्ष देख कर, उसके पीछे अपने जाग-
रण को भी अनुभव करके, फिर इन बातों को ही, सावधान
होकर, प्रतिदिन, और प्रतिक्षण सोचा करे [कि यह जागरण
तो स्वप्नतुल्य ही है] ॥१७२॥ इन स्वप्न और जागरण की पूरी
समता को चिरकाल तक अपने जी में बैठाकर कि जैसे सुपने
के पदार्थ तात्कालिक भोग देते हैं, जैसे वे परिणाम में नीरस
हैं, जैसे वे विनाशी हैं, वैसे ही ये जागरण के पदार्थ भी हैं।
जागरण को सत्य समझना छोड़ देने पर, फिर पहले की तरह
[अज्ञानी अवस्था की तरह] अनुरक्त नहीं होता ।
इन्द्रजालमिदं द्वैतमचिन्त्यरचनात्वतः ।
इत्यविस्मरतो हानिः का वा प्रारब्धभोगतः ॥१७४॥
अचिन्त्य रचनावाले होने से ये सम्पूर्ण भोग्य पदार्थ तो
इन्द्रजाल के समान मिथ्या हैं [युक्ति से इस बात को विचार
लेने पर] जब यह बात किसी विद्वान् को कभी भूलती ही नहीं,
जब कोई विद्वान् प्रत्येक समय इस बात को याद रखने लगता
है, तब फिर वह भले ही अपने प्रारब्ध कर्मों के सुख दुःख रूपी