पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)
Panchadashi by Swami Vidyaranya
by स्वामी विद्यारण्य
Source: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन · 1940 (origin)
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Read in contextतृप्तिदीपप्रकरणम् २८१
है वह कभी टलता नहीं, ['यह मेरा काम कब बन जायगा,
यह आपत्ति मेरी कब टलेगी'] इत्यादि चिन्ता रूपी विष को
मार भगाने वाला यह उपर्युक्त [पूर्वोक्त] बोध ही भ्रम को निवृत्त
कर सकता है। [भ्रम को निवृत्त करने वाला दूसरा कोई भी
इससे अच्छा उपाय नहीं है] इसके प्रताप से सैकड़ों चिन्ताओं
का विषैला प्रभाव नष्ट हो जाता है।
समेऽपि भोगे व्यसनं भ्रान्तो गच्छेन्न बुद्धवान् ।
अशक्यार्थस्य संकल्पाद् भ्रान्तस्य व्यसनं बहु ॥१६९॥
ज्ञानी और अज्ञानी इन दोनों को भोग तो समान ही होता
है। परन्तु भ्रान्त पुरुष व्यसन में फँस जाता है। बुद्धवान्
अर्थात् ज्ञानी को व्यसन नहीं होता। भ्रान्त पुरुष, जो बात
हो ही नहीं सकती, उसी का संकल्प कर बैठता है। इस कारण
भ्रान्त को ही बहुत सा व्यसन होता है [तत्वज्ञानी को अकेला
भोग होता है और अज्ञानी को भोग के साथ ही आगे को उस
भोग का व्यसन भी पड़ जाता है]।
मायामयत्वं भोगस्य बुद्ध्वास्थामुपसंहरन् ।
भुञ्जानोऽपि न संकल्पं कुरुते व्यसनं कुतः ॥१७०॥
विवेकी पुरुष तो भोगों को मायामय जान कर, उनमें से
अपनी आस्था (श्रद्धा, भरोसा) को हटा लेता है, उन्हें भोगता
हुआ भी वह जब कि संकल्प ही नहीं करता तब उस ज्ञानी
को व्यसन कैसे हो ?
स्वप्नेन्द्रजालसदृश मचिन्त्यरचनात्मकम् ।
दृष्टनष्टं जगत् पश्यन् कथं तत्रानुरज्यति ॥१७१॥
जिस विवेकी ने इस जगत् को सुपने या इन्द्रजाल के समान