पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)
Panchadashi by Swami Vidyaranya
by स्वामी विद्यारण्य
Source: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन · 1940 (origin)
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है उसका चलते रहना उन्हें पसन्द नहीं रहता। वे अपनी विवेक
की आंख से उसको बन्द हुआ देखना चाहते हैं ]
नायं क्लेशोऽत्र संसारतापः किन्तु विरक्तता ।
भ्रान्तिज्ञाननिदानो हि तापः सांसारिकःस्मृतः ॥१४५॥
उनके इस अनुताप रूप क्लेश को सांसारिक दुःख नहीं
समझना चाहिए। क्योंकि यह तो उनकी विरक्तता है [संसार
की अनासक्ति के कारण वे ऐसा अनुताप किया करते हैं ] सांसा-
रिक ताप को तो आचार्यों ने भ्रान्ति ज्ञान से उत्पन्न होने वाला
कहा है [यह ताप तो विवेक ज्ञान से उत्पन्न हुआ करता है।
इस कारण यह वैसा हेय नहीं है]।
विवेकेन परिक्लिश्यन्नल्पभोगेन तृप्यति ।
अन्यथानन्तभोगेऽपि नैव तृप्यति कर्हिचित् ॥१४६॥
[ सांसारिक ताप और विरक्तता का भेद भी सुन लो ]
विवेक से परिक्लिष्ट होता हुआ [ज्ञानी] थोड़े से भोग से ही तृप्त
हो जाता है। [उन भोगों को दूर से ही नमस्कार कर लेता है]
विवेक के न होने पर तो अनन्त भोगों के भोग लेने पर भी
कभी तृप्त नहीं हो पाता [यों कामनाओं का निवर्तक होने से,
यह क्लेश तो विवेकमूलक ही है]।
न जातु कामः कामानामुपभोगेन शाम्यति ।
हविषा कृष्णवर्त्मेव भूय एवाभिवर्धते ॥१४७॥
यह कामना कभी भी कामों के भोग से शान्त नहीं होती।
यह [कामना] तो घी से आग की तरह विषयाहुति से उत्तरोत्तर
बढ़ती ही जाती है। [भाव यह है कि—विवेकी की तरह,
अविवेकी लोग भोगों से तृप्त नहीं हो सकते। ऐसी अवस्था में