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पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)

पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)

Panchadashi by Swami Vidyaranya

by स्वामी विद्यारण्य

Source: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन · 1940 (origin)

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DevanagariSanskritpublished726 pages

Page 293 of 726

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Page 293

तृप्तिदीपप्रकरणम् २७३
एवमादिषु शास्त्रेषु दोषाः सम्यक् प्रपंचिताः ।
विमृशन्ननिशं तानि कथं दुःखेषु मज्जति ॥१४१॥
इत्यादि शास्त्रों में विषयों के दोषों को भले प्रकार सम-
झाया गया है । उन दोषों का विमर्श दिन रात करता हुआ
साधक, दुःखों में फँस ही कैसे सकता है ?
क्षुधया पीड्यमानोऽपि न विषं ह्यत्तुमिच्छति ।
मिष्टान्नध्वस्ततृड् जानन्नामूढस्तज्जिघत्सति ॥१४२॥
मूर्ख लोगों की बात हम नहीं कहते, किन्तु जो अमूढ हैं,
जिनकी तृष्णा एक बार मिष्टान्न भोजन से नष्ट हो चुकी है, वे
भूख से व्याकुल होने पर भी, 'यह विष है' यह जान लेने पर
उस विष को खाना नहीं चाहते ।
प्रारब्धकर्मप्राबल्याद्द्भोगेपिच्छा भवेद्यदि ।
क्लिश्यन्नेव तदाप्येष भुङ्क्ते विष्टिगृहीतवत् ॥१४३॥
प्रारब्ध कर्मों की प्रबलता से यदि ज्ञानी को भोगों की
इच्छा हो जाती है तो भी यह बेगार में पकड़े हुए मजदूरों की
तरह दुःखी होता हुआ ही, उन विषयों को भोगा करता है ।
[इच्छा होने पर भी वह कुछ चाव के साथ उन्हें नहीं भोगता]।
भुञ्जाना वा अपि बुधाः श्रद्धावन्तः कुटुम्बिनः ।
नाद्यापि कर्म नश्छिन्नमिति क्लिश्यन्ति सन्ततम् ॥१४४॥
लोक में देखते हैं कि—जो श्रद्धाशील गृहस्थी ज्ञानी होते
हैं, वे भोगों को भोगते हुए भी, सदा यही दुःख माना करते हैं,
कि ओहो ! अभी तक भी हमारे कर्म क्षीण नहीं हो पाये ।