पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)
Panchadashi by Swami Vidyaranya
by स्वामी विद्यारण्य
Source: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन · 1940 (origin)
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Read in contextचित्रदीपप्रकरणम् १८३
में किये बैठा है। 'सर्वेश्वर' वह है जिसने इस बाह्य जगत् पर
आधिपत्य जमा रक्खा है। वायु को बहने का, अग्नि को जलने
का, सूर्य को चक्कर काटते रहने का, मृत्यु को मारने का आदेश
जो दिया करता है वही 'सर्वेश्वर' है। वही एक तत्व शरीरों के
अन्दर रहकर उनका नियमन करके 'अन्तर्यामी' कहा जाता
है। वही एक तत्व शरीरों से बाहर सब भूत भौतिक पदार्थों का
नियमन करके 'सर्वेश्वर' कहाने लग जाता है।
एतस्य वा अक्षरस्य प्रशासन इति श्रुतिः ।
अन्तः प्रविष्टः शास्तायं जनानामिति च श्रुतिः ॥१८१॥
एतस्य वा अक्षरस्य प्रशासने गार्गि सूर्याचन्द्रमसौ विधृते तिष्ठतः
(बृ. ३-८-९) इस श्रुति में ईश्वर को बाह्य नियामक किंवा
'सर्वेश्वर' कहा है। अन्तः प्रविष्टः शास्ता जनानाम् इस श्रुति में
ईश्वर को अन्दर का नियामक किंवा 'अन्तर्यामी' बताया
गया है।
जगद्योनिर्भवेदेष प्रभवाप्ययकृत्वतः ।
आविर्भावतिरोभावावुत्पत्तिप्रलयौ मतौ ॥१८२॥
उत्पत्ति और विनाश दोनों ही को करने वाला होने से,
यही जगत् का योनि है। यहां उत्पत्ति और प्रलय का अभिप्राय
आविर्भाव और तिरोभाव है [यों तो उत्पत्ति और विनाश किसी
वस्तु का होता ही नहीं, केवल इतना ही होता है कि कभी वह
वस्तु प्रकट हो जाती है और कभी तिरोभूत हो जाती है।]
आविर्भावयति स्वस्मिन् विलीनं सकलं जगत् ।
प्राणिकर्मवशादेष पटो यद्वत् प्रसारितः ॥१८३॥
जैसे लपेटा हुआ चित्रपट जब फैला दिया जाता है तब