पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)
Panchadashi by Swami Vidyaranya
by स्वामी विद्यारण्य
Source: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन · 1940 (origin)
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Read in context१८२ पञ्चदशी
न मप्रियः। अन्तः प्रविष्टः शास्ता जनानाम् हमारा हाकिम हमारे अन्दर
बैठा हुवा है। जब हम कोई बुरा काम करने लगते हैं तब अन्दर से
घृणा भय और संकोच आदि की आवाज़ आती हैं। जब हम कोई
शुभ कार्य करते हैं तब अन्दर से प्रेम निर्भयता और उत्साह आदि
की स्फूर्ति होती है। ये ही सब ईश्वर की आज्ञायें हैं ! जो लोग
मनुष्यसमाज में अधिक संस्कृत होते हैं उन्हें ये आज्ञायें बड़ी
स्पष्ट सुनाई पड़ा करती हैं। जो निरन्तर पापाचारी होते हैं उन्हें
ये आवाजें सुनाई पड़नी बन्द हो जाती हैं। जिन्हें ये आज्ञायें
स्पष्ट सुनाई पड़ती हैं उन्होंने ही उन आवाज़ों को साधारण लोगों
के उपकार के लिये, उनके अन्दर की मुर्दा आवाज़ को जगाने
के लिए और उसके अनुकूल उनका आचरण कराने के लिये,
पुस्तकों में लिख दिया है। ऐसे ये लेख ही 'श्रुति' और 'स्मृति' हैं।
यों 'श्रुति' और 'स्मृति' ईश्वर की आज्ञायें हैं। वेदों के अपौरुषेय
होने का कारण भी यही है कि ये आवाजें बनायी नहीं जाती
किन्तु ऐसी की ऐसी ही साधक लोगों को—सत्यान्वेषी लोगों
को सुनाई पड़ा करती हैं। सुनाई पड़ने के कारण ही उनको
'श्रुति' कहा है ।
आज्ञाया भीतिहेतुत्वं भीषास्मादिति हि श्रुतम् ।
सर्वेश्वरत्वमेतत् स्यादन्तर्यामित्वतः पृथक् ॥१८०॥
भीषास्माद्वातः पवते तै० २-८ इत्यादि श्रुतियों में आज्ञा के
द्वारा ईश्वर को भय का कारण बताया गया है। [आज्ञा के
कारण] उस ईश्वर में जो 'सर्वेश्वरता' आती है वह 'अन्तर्यामि-
पने' से पृथक् ही एक धर्म है।
'अन्तर्यामी' वह है जो हम सब को अन्दर से अपने बस